Friday, January 2, 2026
चाँद टूट रहा है
Friday, December 19, 2025
वह चाहता था एक पवित्र भूमि
निकाह
Thursday, October 9, 2025
विश्वगुरु
काँच का सिंहासन
वे निर्वासित प्रतिभाएँ
जिन्हें अब अभिनय के गलियारे छोटे पड़े,
जिन्हें अब लोक-गीत की धुनें नीरस लगीं।
वे आए हैं;
अपने चमकदार चोगे
और स्व-निर्मित आभा-मंडल के साथ।
फिल्मी नायक, अब राजनीति के महाकाव्य के
'अंतिम हीरो' बनना चाहते हैं,
और गायक, मत-पेटी के राग में
अपना स्वर-माधुर्य घोलना चाहते हैं।
उनकी नज़रों में
चुनाव का टिकट 'अमरत्व' का प्रमाण-पत्र है,
जहाँ यश की भूख और सत्ता का प्रलोभन
एक ही अंधेरे कुएँ में उतरते हैं।
पद मिला— तो देश की देहरी पर नहीं,
उनके 'अहं' के प्रांगण में प्रवेश हुआ।
समस्याएँ?
वे तो थीं, पुरानी स्क्रिप्ट में!
अब नई पटकथा में,
भुखमरी और मंहगाई एक अमूर्त सांख्यिकी है,
और बेरोज़गारी केवल विरोधियों का प्रलाप।
वे कुर्सी पर नहीं,
एक काँच के सिंहासन पर बिराजते हैं
जो उन्हें हर कोण से
केवल अपना ही विस्तीर्ण अक्स दिखाता है।
वे जनता से नहीं,
केवल अपनी छाया से संवाद करते हैं।
यह आत्ममुग्धता!
यह 'स्व' का वह कैक्टस है,
जो राज्य की उर्वरा भूमि में
अपनी जड़ें जमा चुका है।
जनता की कराह?
वह उनके अट्टालिकाओं तक आते-आते,
एक मंद और अपरिचित ध्वनि बन जाती है।
इतिहास साक्षी है:
वे आए, उन्होंने स्वयं को पूजा,
देश की वेदना को स्मृति-भ्रंश समझा।
और जब उनका अभिनय समाप्त होगा
वे लौट जाएँगे,
पदक और धन लेकर।
पर देश का रंगमंच?
वह वहीं रहेगा
अगले प्रसिद्ध विदूषक की प्रतीक्षा में,
जिसे 'अंधकार' को 'प्रकाश' कहने का
तीव्र मोह है।
Sunday, October 5, 2025
पटरी पर
Thursday, September 25, 2025
नेक्रोफिलिया सत्ता का लोकगीत
राख का युग
Tuesday, September 2, 2025
चुनाव
Monday, September 1, 2025
गिरगिट
Tuesday, August 19, 2025
दशानन
जेब में उंगली
कटोरा गया किस्मत सो गई
थार थाली और थैली
लोकतंत्र के मच्छर
भगवान ऑफलाइन हैं
मनहूसियत का वरदान
सांसे मलबे में दफन है
Monday, July 14, 2025
मच्छर
Thursday, July 10, 2025
वीरगति
चाँद टूट रहा है
चाँद टूट रहा है— और उसके विखंडन से उठी धूल आकाश की नहीं, पूरी पृथ्वी की साँसों में भर रही है। धरती अब ग्रह नहीं, एक थकी हुई देह है— जहाँ नदि...
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वे निर्वासित प्रतिभाएँ जिन्हें अब अभिनय के गलियारे छोटे पड़े, जिन्हें अब लोक-गीत की धुनें नीरस लगीं। वे आए हैं; अपने चमकदार चोगे और स्व-नि...
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*थार, थाली और थैली* जिस दिन गांव को मिला साल का विकास अनुदान, उसी शाम प्रधान जी लौटे नई चमचमाती थार में। बोले— "गांव अब रफ्तार पकड़ेगा!...
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यह देश जहाँ भूख अब आँकड़ों की भाषा बोलती है, और रोटी सरकारी रिपोर्ट की पंक्ति में मर चुकी है। जहाँ कफ सिरप पीकर मरे बच्चों के गले में अब भ...