Friday, January 2, 2026

चाँद टूट रहा है

चाँद टूट रहा है—
और उसके विखंडन से उठी धूल
आकाश की नहीं,
पूरी पृथ्वी की साँसों में भर रही है।
धरती अब ग्रह नहीं,
एक थकी हुई देह है—
जहाँ नदियाँ बहना भूल चुकी हैं
और सागर
कीचड़ में बदलकर
अपने ही जल से शर्मिंदा हैं।
उधर एक विमान
निर्लज्ज गति से
मंगल की ओर बढ़ चला है।
उसमें बैठे हैं—
सत्ता की कुर्सियों से चिपके राजनेता,
धर्म को ठेके पर उठाए सौदागर,
पूँजी के कवच में छिपे
मानवता के शिकारी,
मंत्रों और कथाओं को
ढाल बनाए
आस्था के दलाल।
वे पलायन नहीं कर रहे—
वे अपने विस्तार की
नई भूमि खोज रहे हैं।
और उधर मंगल—
लाल नहीं,
भय से निर्वर्ण—
सूर्य की ओर देखता है।
वह पुकारता है—
“हे सूर्य,
इससे पहले कि यह विमान
मेरी मिट्टी को छुए,
मुझे जला दे।
मेरी चट्टानों को भस्म कर,
मेरे आकाश को राख कर दे,
मेरे अस्तित्व को
अग्नि में विलीन कर दे—
मुझे
दूसरी पृथ्वी मत बनाना।”

Friday, December 19, 2025

वह चाहता था एक पवित्र भूमि

वह चाहता था एक पवित्र भूमि

वह दिन-रात इसी सोच में लगा रहता,
कि यह भूमि एकरंगी हो जाए,
जहाँ मंदिरों की घंटियाँ गूंजें,
और अज़ानों की प्रतिध्वनि
कभी सुनाई न दे।

उसे लगता था –
देश में शांति तभी आएगी,
जब सब एक जैसे दिखेंगे,
एक जैसे सोचेंगे,
और एक ही ईश्वर को पूजेंगे।
भगवान ने शायद सुना भी,
क्योंकि एक दिन सचमुच
देश मुसलमानों से मुक्त हो गया।

पर वह क्या जाने,
मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन
“दूसरा” नहीं,
“स्वयं का मन” होता है।

अब ज़मीन पर वही थे
जिन्होंने मंदिर बनाए थे।
फिर भी मंदिरों के बीच
दीवारें उठने लगीं।
कोई ऊँचा, कोई नीचा,
कोई शुद्ध, कोई अपवित्र—
शांति की जगह
फिर वही शोर।

उसने माथे पर हाथ रख कहा —
“दलितों को कहीं और भेज दो!”
और सचमुच,
इतिहास ने उसकी बात मानी।
दलित चले गए।

पर अब?
जहाँ केवल सवर्ण बचे,
वहाँ भी शांति न आई।
ब्राह्मण बोला – “मंत्र मेरा!”
क्षत्रिय बोला – “शस्त्र मेरा!”
और फिर वही रक्त,
वही गर्व,
वही युद्ध।

थककर उसने परशुराम का आह्वान किया,
“प्रभु, एक बार फिर धरती को
क्षत्रियों से मुक्त कर दो!”
वह भी मान गए।
धरती पर अब केवल ब्राह्मण बचे।

पर भूख भी तो ब्राह्मण थी —
ज्ञान की नहीं, अनाज की।
सो खेत जोते, हल चलाए,
पसीने की बूंदों में ब्रह्म भी भीग गया।
किसी ने कहा – “जो खेती करे, वह शूद्र।”
किसी ने कहा – “जो व्यापार करे, वह वैश्य।”
और देखते ही देखते,
फिर वही चार वर्ण लौट आए।

अब फिर युद्ध हुआ —
मंत्रों का, मंत्रियों का,
धर्म का, धर्माचार्यों का।
जो हारा, वही अधम कहलाया,
जो जीता, वही आर्य।

एक दिन,
उनमें से कुछ लोग
थक गए युद्धों से।
उन्होंने कहा –
“हम एक नया रास्ता बनाएँगे,
जहाँ सब बराबर हों,
जहाँ सिर झुकाकर नहीं,
दिल मिलाकर जिया जाए।”

उन्होंने नियम बनाए —
सामूहिक प्रार्थना के,
रोज़े के, नमाज़ के,
शांति और समर्पण के।
लोगों ने उन्हें नया नाम दिया —
“मुसलमान।”

अब फिर वही दृश्य लौट आया।
फिर वही डर, वही दीवारें,
वही नफरतें।
और वह —
जो आरंभ में सोचता था
कि “अब सब शुद्ध हो जाएँगे,”
देखता रह गया —
कैसे हर शुद्धता
नए अपवित्र की खोज करती है।

उसकी बुद्धि जड़ हो गई,
जैसे पत्थर हो गया वह —
क्योंकि उसे अब समझ आया
कि मनुष्य की सबसे पुरानी प्रार्थना
“हे ईश्वर, मुझे श्रेष्ठ बना”
ही सबसे बड़ा श्राप है।

और धरती ने कहा —
“मैं सबकी थी, सबकी रहूँगी,
पर हर युग में कोई न कोई
मुझे बाँटता रहेगा।
नाम बदल जाएँगे,
धर्म बदल जाएँगे,
पर वह जो बाँटता है —
उसका चेहरा वही रहेगा।”

निकाह

मुहल्ले के मोड़ पर
एक घर था
जहाँ पहला निकाह,
फिर दूसरा निकाह,
फिर तीसरा निकाह
यूँ बदलते रहे
जैसे बरसात में गीले कपड़े।

एक जनाब थे
पहले ट्रक हाँकते थे,
अब ज़िम्मेदारियाँ
सड़क की धूल की तरह
हवा में उड़ा देते हैं।

एक बेगम थीं
जिन्हें लगा कि
ख़्याल रखने का हक़
किसी और मुस्कान में ज़्यादा है।
सो उधर चल पड़ीं,
जहाँ पहले से ही
रौनक इतनी थी
कि पाँच बच्चों का झूला
दरवाजे पर झूल रहा था।

फिर क्या था
दोनों तरफ़
नए सपने, नए वादे,
और नए-नए रोने की उम्मीदें।
पुराने दस के दस फूल
सरकारी आँगन में छोड़ दिए गए,
जहाँ “ममता” पोस्टर पर मुस्कुराती है
और बच्चों के कपड़े
दूध के पैकेट की तरह
सरकारी ठप्पे से चलते हैं।

इधर जिन जनाबों को
पहले “घर का सरदार” कहा जाता था,
वो भी अब ताज़ा अध्याय खोल चुके हैं
नया रिश्ता, नई परवरिश,
और शायद नए-नए नाम
गली के स्कूल में दर्ज होते हुए मिल जाएँ।

पर हम?
हम कौन होते हैं कहने वाले?
हमारे हिस्से में तो बस
ताली बजाने का अधिकार बचा है
कभी मंच पर,
कभी मुनादी में,
कभी आँकड़ों में।

कोई चाहे जितने रिश्ते बदले,
चाहे जितने पालने झुलाए,
या छोड़ आए
हम तो बस यही कहेंगे
कि दुनिया की आबादी का अंक
हमारी जेब से थोड़ी भरता है!

इसीलिए
जो चलता रहे चलने दो
और बढ़ते हुए बच्चों की भीड़ को
बस गिनती में जोड़ने दो।

आख़िरकार,
हम कौन बोलने वाले?
हम तो बस रहने वाले
एक ऐसे समाज में
जहाँ ज़िम्मेदारियाँ
अक्सर निकाह के कपड़ों की तरह
बार-बार बदल ली जाती हैं।

      -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

Thursday, October 9, 2025

विश्वगुरु

यह देश 
जहाँ भूख अब आँकड़ों की भाषा बोलती है,
और रोटी 
सरकारी रिपोर्ट की पंक्ति में मर चुकी है।
जहाँ कफ सिरप पीकर मरे बच्चों के गले में
अब भी झुनझुने बँधे हैं 
ताकि दुनिया को लगे,
वे अब भी खेल रहे हैं।

यह वही देश है 
जहाँ न्याय की चौखट पर
जूता गिरता है,
और न्यायाधीश उसे “लोकतांत्रिक असहमति” बताकर
माथे पर रख लेते हैं।
जहाँ सत्य का गला घोंटने के बाद
हर नेता माइक पर कहता है 
“मुझे देश पर गर्व है।”

जहाँ दलित का चेहरा मूत्र से धोया जाता है,
और अपराधी
तीर्थयात्रा पर भेज दिया जाता है
‘संस्कार सुधार’ के नाम पर।

जहाँ स्त्रियाँ
व्रत रखती हैं पति की दीर्घायु के लिए,
और पति रखता है
दूसरी के लिए भविष्य निधि।

जहाँ ढाई साल की बच्ची के साथ
ईश्वर की संतानें खेलती हैं 
और देवता उस समय ध्यान में लीन रहते हैं,
क्योंकि वह ‘धार्मिक उत्सव’ का मौसम होता है।

यह वही देश है 
जहाँ प्रेम करना देशद्रोह है,
जहाँ विवाह से पहले सोचने वाली स्त्री
‘संस्कृति की शत्रु’ कहलाती है।
जहाँ भाषा का लहजा,
वस्त्र का रंग,
भोजन की गंध,
और नाम का उच्चारण
राष्ट्रभक्ति का मापदंड है।

जहाँ मंदिरों की सीढ़ियों पर
नफ़रत की आरती होती है,
और स्कूलों में बच्चे
पहचान का पाठ पढ़ते हैं 
“मैं कौन, तू कौन।”

यह वही देश है 
जहाँ हिमालय की निस्तब्धता में
एक विज्ञानी को बन्द कर दिया गया,
क्योंकि उसने कहा 
“बर्फ़ पिघल रही है।”
शासन ने सोचा 
यह तो राज़ खोल रहा है।
और उसकी चुप्पी को भी
देशद्रोह की भाषा में अनुवादित कर दिया गया।

जहाँ किसान की पीठ
सरकारी कर्ज़ की रसीद बन चुकी है,
और उसकी आत्महत्या 
सांख्यिकी का ‘पाद-टिप्पणी’।

जहाँ कवि जब लिखता है
तो थाने में फोन बजता है,
और पत्रकार का माइक
गिरवी रखा होता है किसी निवेशक के पास।

जहाँ विश्वविद्यालयों के गलियारों में
अब विचार नहीं कैमरे टंगे हैं।
जहाँ हर सवाल
एक प्राथमिकी में बदल जाता है।

यह वही देश है 
जो विश्वगुरु बनने की साधना में
सत्याग्रह को “विघटन”
और विवेक को “अपमान” कहता है।

जहाँ संविधान की आत्मा
हर सुबह नये शपथपत्र में दफ़नाई जाती है,
और हर शाम संसद में
लोकतंत्र की राख पर
“जय श्री…” का नया नारा चढ़ाया जाता है।

जहाँ इतिहास को
भूख के नाम पर भूखा रखा गया है,
और भविष्य को
राष्ट्रभक्ति के तेल में जलाया जा रहा है।

कहो,
अब और क्या शेष है
विश्वगुरु बनने के लिए?
शायद बस इतना 
कि मरता हुआ मनुष्य भी
मरने से पहले कहे 
“मैं भाग्यशाली हूँ,
क्योंकि मैंने इस देश में मरना सीखा।”

काँच का सिंहासन

 वे निर्वासित प्रतिभाएँ

जिन्हें अब अभिनय के गलियारे छोटे पड़े,

जिन्हें अब लोक-गीत की धुनें नीरस लगीं।

वे आए हैं;

अपने चमकदार चोगे 

और स्व-निर्मित आभा-मंडल के साथ।

फिल्मी नायक, अब राजनीति के महाकाव्य के

'अंतिम हीरो' बनना चाहते हैं,

और गायक, मत-पेटी के राग में

अपना स्वर-माधुर्य घोलना चाहते हैं।

उनकी नज़रों में

चुनाव का टिकट 'अमरत्व' का प्रमाण-पत्र है,

जहाँ यश की भूख और सत्ता का प्रलोभन

एक ही अंधेरे कुएँ में उतरते हैं।

पद मिला— तो देश की देहरी पर नहीं,

उनके 'अहं' के प्रांगण में प्रवेश हुआ।

समस्याएँ? 

वे तो थीं, पुरानी स्क्रिप्ट में!

अब नई पटकथा में,

भुखमरी और मंहगाई एक अमूर्त सांख्यिकी है,

और बेरोज़गारी केवल विरोधियों का प्रलाप।

वे कुर्सी पर नहीं,

एक काँच के सिंहासन पर बिराजते हैं

जो उन्हें हर कोण से

केवल अपना ही विस्तीर्ण अक्स दिखाता है।

वे जनता से नहीं,

केवल अपनी छाया से संवाद करते हैं।

यह आत्ममुग्धता!

यह 'स्व' का वह कैक्टस है,

जो राज्य की उर्वरा भूमि में

अपनी जड़ें जमा चुका है।

जनता की कराह?

वह उनके अट्टालिकाओं तक आते-आते,

एक मंद और अपरिचित ध्वनि बन जाती है।

इतिहास साक्षी है:

वे आए, उन्होंने स्वयं को पूजा,

देश की वेदना को स्मृति-भ्रंश समझा।

और जब उनका अभिनय समाप्त होगा

वे लौट जाएँगे,

पदक और धन लेकर।

पर देश का रंगमंच?

वह वहीं रहेगा

अगले प्रसिद्ध विदूषक की प्रतीक्षा में,

जिसे 'अंधकार' को 'प्रकाश' कहने का

तीव्र मोह है।

Sunday, October 5, 2025

पटरी पर

पटरी पर

नेता ने कहा—
“अब इस देश को
पटरी पर लाना
सिर्फ हम ही जानते हैं।”

सभा में शोर उठा,
जैसे शब्द ही समाधान हों,
जैसे वादे ही विकास हों।

पर भीड़ से कोई आम आदमी
धीरे से मुस्कुराया,
उसकी हँसी में छिपी थी
सालों की पीड़ा।

उसने कहा—
“लोगों ने बड़ी मुश्किल से
शौचालय जाना सीखा है,
अब हमें मत उतारो
फिर से पटरी पर।

पटरी हमारे लिए
सिर्फ रेलवे लाइन नहीं,
बल्कि वही पुराना रास्ता है
जहाँ गरिमा खो जाती थी
और बदबू बनती थी
हमारी पहचान।”

उसकी आवाज़ ने
सभा का शोर निगल लिया।
नेता की पटरी और
जनता की ज़िंदगी—
दो समानांतर रेखाएँ हैं,
जो कभी मिलती नहीं,
सिवाय व्यंग्य की कविता में।

Thursday, September 25, 2025

नेक्रोफिलिया सत्ता का लोकगीत

*नेक्रोफिलिक सत्ता का शोकगीत*

व्यवस्था मर चुकी है।
उसकी नब्ज़ में रक्त नहीं,
केवल अभिलेखों की धूल है।
उसकी आँखें
फ़ाइलों के बोझ तले दबकर
काँच जैसी जड़ हो चुकी हैं।

फिर भी,
सत्ता उसकी ठंडी देह पर झुककर
भक्ति का नाटक रचती है।
जैसे मृत देह ही
उसकी सबसे बड़ी कामना हो।

न्याय
जो जीवित आत्मा होना चाहिए था,
अब स्थगनों और तारीख़ों की
लंबी शृंखला है।
हर निर्णय
इतिहास की परतों में दबा
मृत दस्तावेज़ है।

अर्थव्यवस्था
जिसे जीवित प्रवाह होना चाहिए था,
अब आंकड़ों के शवघर में
बंद कर दी गई है।
जीडीपी की हर रेखा
इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम की
एक मरी हुई तरंग है।

समाज
जो प्रश्न पूछता था,
अब नारों और जुलूसों की
गूंगी परेड बन चुका है।
यह भी
मृत देह की तरह है
जिसे रंग-बिरंगे कपड़ों में
ढँककर दिखाया जा रहा है।

और अफसरशाही
वह तो इस शवयात्रा का
मुख्य पुजारी है।
फ़ाइलों के कफन बेचते हुए
हर दस्तख़त की कीमत तय करता है।
भ्रष्टाचार उसका हवन है,
और जनता उसका चढ़ावा।
वह जानता है
कि मुर्दा व्यवस्था
सबसे सुरक्षित है
क्योंकि उसमें विरोध नहीं,
केवल मौन होता है।

यह नेक्रोफिलिक आकर्षण क्यों?
क्योंकि जीवित चीज़ें असहज करती हैं।
वे प्रश्न पूछती हैं,
वे परिवर्तन मांगती हैं।
मुर्दा चीज़ें
सिर्फ़ आकर्षण देती हैं
बिना शर्त, बिना प्रतिरोध।

इसलिए सत्ता और अफसरशाही
जीवित सुधार की पीड़ा से बचकर
मुर्दा व्यवस्था की देह पर झुकते हैं।
वह मृत शरीर उनका सबसे सुरक्षित प्रेम है।
और वे उसी से
सत्ता का अनंत सुख लेते हैं।

दर्शक मंडली मौन खड़ी है।
उनके हाथों में फूल हैं
वे हर गिरते पत्ते को
अर्पण मानते हैं।

यात्री साथ चल रहे हैं,
पर वे दिशा नहीं पूछते।
वे मानते हैं
कि शवयात्रा ही तीर्थ है।

याजक मन्त्र पढ़ते हैं,
पर उनका स्वर रिक्त है।
फिर भी भीड़
हर शून्य को
आशीर्वाद समझ लेती है।

फूल गंध नहीं पहचानते,
केवल धूप के धुएँ से 
भ्रमित होते हैं।
कठपुतली 
अपने ही धागों पर थिरकती है, 
और इसे स्वतंत्रता समझ लेती है।

मृग 
मरीचिका के जल में 
प्यास बुझाता है, 
और मरुस्थल को स्वर्ग कहता है।

दर्शक जानते हैं
कि वे धागों से बँधे हैं,
फिर भी ताली बजाते हैं।
यात्री जानते हैं
कि रास्ता अंधकार की ओर है,
फिर भी दीपक हवा में उठाते हैं।

भीड़
जिसे जीवन चाहिए था,
अब मृत्यु को उत्सव मान चुकी है।
और यही उसका सबसे बड़ा अपराध है।

राख का युग

राख का युग

अब कोई शंख नहीं बजता।
ध्वनि है—पर अर्थ से रिक्त,
मानो आकाश में लटका
एक टूटा हुआ नक्षत्र।

कभी बर्फ़ पर उगते सूरज के स्वप्न थे,
अब राख में दबी चिंगारियाँ हैं,
जिन्हें हथेलियों से ढककर
ज्योति का भ्रम बनाया जाता है।

कभी गिरते सिक्के
गौरव और अपमान की भाषा थे,
अब परछाइयाँ ही
माप का एकमात्र पैमाना हैं।

लोग
मृग की तरह
दूर चमकते जल के पीछे भागते हैं।
हर बार प्यासे लौटते हैं,
और फिर भी समझते हैं
कि तृप्त हो चुके हैं।

कभी खेतों में अन्न की बात थी,
आज केवल मंत्रों की धूल उड़ती है।
धूल ! हाँ ऐसी धूल
जो सुनहरी भी लग सकती है
यदि आँखें बंद कर ली जाएँ।

दीवारें थीं
ईंटों से बनी नगरों की।
अब वे खंडहर हैं
जिन पर नारे उगते हैं
जैसे काई।

जनता कठपुतली है,
धागे उसके अपने ही हैं,
पर वह यह भूल जाती है
कि धागे खींचने वाला
कोई और है।

कभी गति की बातें थीं
चक्र, धारा, पंख और पथ।
अब केवल
एक रथ है,
जो पुरानी पटरियों पर
भविष्य का बोझ ढोता है।

महँगाई और बेरोज़गारी के दैत्य
अब सड़कों पर नहीं दिखते,
वे भीड़ के भीतर
देवताओं के मुखौटे पहनकर
मौन जुलूस निकालते हैं।

स्वर्णिम युग के कथन
किसी टूटे हुए पुल पर लिखे
शिलालेख हैं,
जिन्हें हर जुलूस के बाद
नए झंडे ढक देते हैं।

वो संकल्प की अवधि 
जो कभी व्रत की तरह सुनाए गई थी
अब
कैलेंडर की पीली पन्नियों में
धूल खाती है।

वे करोड़ों रोजगार के सपने
अब केवल
शून्य में टिके हैं
जहाँ शून्य ही उत्तर है।

धुआँ है,
पर आग दिखाई नहीं देती।
राख है,
पर मृत्यु की गंध दबा दी गई है।
जनता है,
पर आँखें माला फेरती हैं।

और वह
जो कभी प्रतिज्ञाओं का यात्री था,
अब भूलभुलैया का व्यापारी है।
नक्शे बेचता है
जो कहीं नहीं ले जाते।

ऐसा क्यों है?
क्योंकि दीवारें हमेशा ढहती हैं।
सपनों की छत टिक नहीं पाती।

क्योंकि लोग भूख भुला सकते हैं,
पर प्रतीक नहीं।
मरीचिकाएँ
अक्सर
अमृत से भी मीठी लगती हैं।

और क्योंकि
भीड़ प्रश्नों से नहीं,
उत्तरहीन प्रतीकों से तृप्त होती है।
वह अपनी ही परछाईं को
देवता मान लेती है।
और धागों से बँधी कठपुतली
अपनी थिरकन को
स्वतंत्रता समझ लेती है।

जनता जानती है
दैत्य उसके दरवाज़े पर हैं,
पर वह आँखें मूँदकर
मंत्रों की राख को 
माथे पर मल लेती है।

जनता समझती है
भूख उसका पीछा कर रही है,
पर वह थाली में पड़े
खाली प्रतीकों को ही
प्रसाद मान लेती है।

जनता देखती है
उसके धागे खिंच रहे हैं,
पर वह नाचते हुए
खुद ही ताली बजाती है।

Tuesday, September 2, 2025

चुनाव

चुनाव से कुछ दिन पहले
गांव की गलियों में
मेले-सा हुजूम उतरा।

पहले दिन आए नोटों के बादशाह,
हाथ जोड़ते, मुस्कान फैलाते,
नोट बरसाते ऐसे
जैसे सावन की पहली बौछार।
बोले – “वोट मुझे देना,
अबकी बार किस्मत चमक जाएगी।”

दूसरे दिन राशन का रथ आया,
तेल, दाल, चावल की महक के साथ।
बोले – “हम ही तुम्हारे असली साथी हैं,
भूख अब कभी लौटकर न आएगी।”

तीसरे दिन गूंजा ढोल-नगाड़ा,
बोतलों का पर्व मनाया गया।
गिलास छलके, गीत बजे,
और वादे भी शराब की तरह झागदार निकले।

हर दिन एक नया तमाशा,
कभी साड़ी, कभी घड़ी, कभी कबाब।
गांव वालों के दरवाज़े
बाज़ार की दुकान बन गए।

भोले-भाले गांव वाले
खामोश मुस्कुराते रहे,
जैसे कोई बच्चा
पंडाल का नाटक देखता है।
पर उनकी आँखों में
एक अजीब-सी चमक थी।

जब चुनाव परिणाम आए –
नेताओं के चेहरे सूख गए।
नोट बर्बाद, राशन व्यर्थ,
दारू का नशा काफ़ूर।

ईवीएम से जो आवाज़ निकली
वह रहस्य की तरह गूंजी –
“इस गांव ने वोट किसी दल को नहीं दिया…”

भीड़ सन्नाटे में डूब गई।
नेता हक्के-बक्के,
गांव वाले निर्विकार।

फिर अचानक चौपाल से हंसी उठी –
“हमने तो सब लिया,
पर बटन दबाया
उस प्रतीक पर
जिसे बैलेट पेपर में
कोई खोज भी न पाया।”

किस प्रतीक पर?
किस नाम पर?
यह रहस्य वहीं थम गया…

गांव आज भी मुस्कुरा रहा है,
और नेता आज भी सोच रहे हैं –
“आख़िर वोट गया कहां?”

Monday, September 1, 2025

गिरगिट

// गिरगिट//

बग़ीचे में एक प्राणी रहता है
कभी पत्तियों सा हरा, कभी धूप सा पीला,
कभी छाल के रंग का गाढ़ा-सा स्याह।
लोग उसे गिरगिट कहते हैं।

गाँव के चौपाल पर चर्चा चली
"यह जीव बड़ा चालाक है,
हर हाल में अपना रंग बदल लेता है।"
एक बूढ़ा मुस्कुराया
"रंग बदलना तो बेगुनाही है बेटा,
असली चालाक वे हैं,
जो मुस्कुराहट बदलकर दर्द छुपा लेते हैं।"

गिरगिट ने कान खुजाते हुए कहा
"भाई, मेरा दोष क्या?
मैं तो सिर्फ़ बचाव में रंग बदलता हूँ,
न मेरा कोई घोषणापत्र है,
न कोई चुनाव चिन्ह।
न मैं हवा का रुख देखकर विचार बदलता हूँ,
न मंच बदलते ही रिश्ते।"

भीड़ हँस दी।

पेड़ पर बैठे कौए ने टहोका मारा
"सच है,
गिरगिट का रंग बदलना तो प्राकृतिक है,
पर इंसानों का रंग बदलना—
कुर्सी की रसायन शाला का कमाल है।"

धीरे-धीरे सब चुप हो गए।
गिरगिट झेंपकर बोला
"मेरी तुलना उनसे मत करो,
मैंने आज तक सिर्फ़ अपनी खाल बदली है,
चरित्र नहीं!"

        -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

Tuesday, August 19, 2025

दशानन

*दशानन की आफत आई*

रावण आया पृथ्वी पर, 
बदला युग का रंग,
दस सिर लेकर घूमता, 
छिड़ गई कैसी जंग।
कहता – "मैं तो ज्ञानी था, 
ब्रह्मा से मिला वरदान,
अब तो बच्चे चिढ़ाते, 
कहते  'मल्टीफेस्ड इंसान'!" 

मोबाइल वाला स्टोर गया, 
बोला-"लाओ फोन",
सेल्समैन ने हँस के कहा 
"तुममें असली कौन है
और कौन है 'क्लोन'?"
"दस चेहरों की Face ID, 
हमसे न हो पाए,
Apple बोले – 
'ऐसे केस में सिस्टम ही घबराए!'

कैफे में कॉफी पीने बैठा, 
हुआ बड़ा घमासान,
हर एक सिर ने माँगी चीज़ें,
उड़ा गया मग–प्लान!
एक बोला – "ब्लैक चाहिए",
दूजा बोले – "लट्टे",
तीसरा माँगे ‘शुगर फ्री’, 
बाकी बोले – “कट्टे!!”

गया बैंक खाता खुलवाने, 
बैंक मैनेजर घबराया,
"दस सिग्नेचर कौन करे? 
पहले सिर को लाया?"
"आधार कार्ड एक है या फिर दस?" 
पूछा सब हैरान,
रावण बोला – 
"भइया अब तो, कटवा लूं पहचान?" 

टिंडर ऐप पर आया मैसेज – 
'Hi Handsome Rav !',
लड़की बोली – 
"तू ही था क्या रामायण का 
'बॉस फिनाले राव'?"
"दस-दस दिमाग़ों से क्या तू, 
एक राय बना पाता?"
रावण बोला – "बस दिल एक है, 
बाकी सब तो जाने दाता!" 

पार्लर में कटवाने बाल, 
पहुँचा रावण तेज चाल से,
हैयरड्रेसर बोला –
 “कटिंग होगी टाइम के हिसाब से।”
“हर सिर की अलग स्टाइल हो 
या सबका एक ही टोन?”
रावण बोला – 
"इतना बिल मत बना देना 
कि लेना पड़ जाए लोन।"

शादी करने पहुंचा तो 
पंडित जी घबरा गए,
"दस बार ‘सप्तपदी’ लेंगे? 
दूल्हा खुद हकला गए!"
दुल्हन बोली – 
"एक पति ही है मुश्किल, 
तू दस-दस में बंटा!"
रावण बोला – 
"इन सिरों में बस एक समय में
 एक से ही प्यार जता!"

अंत में बोला दशानन, 
अपना युग अपनी लंका 
ही है मित्र भली,
"इस युग ने तो बुद्धि मुझसे,
 हँसते -हँसते हर ली!"
"ज्ञान रहा ना सम्मान कोई, 
सब पूछें एक ही बात,
दस सिर क्यों हैं तुझ पर,
तू आदम की कौन सी जात"।

             -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

जेब में उंगली

*जेब में उँगली*

कटघरे में नहीं,
वो खड़ा था अपनी भूख के सामने।
जज की आँखें नहीं थीं —
बस एक फॉर्म था,
FIR नंबर — 347/21।

नाम?
"भोला"।
पता?
"जहाँ रात भर कहीं ठहरने की जगह मिल जाए।"

उसने जेब में हाथ डाला —
न किसी की गरीबी चुराने,
बस थोड़ी गर्मी उधार लेने।

लेकिन जेब में जो था,
वो महज़ नोट नहीं थे —
वो जात वाले काग़ज़ थे,
जिन पर लिखा था:
"इन्फ्लुएंस", "सत्ता", "सरकार"।

हाथ गया नहीं कि
साइरन चीखा,
लाठियाँ बरसीं,
और अगले दिन अख़बार की हेडलाइन बनी —
"एक और जेबकतरा पकड़ा गया!"

मगर किसी चैनल ने
ब्रेकिंग न्यूज़ नहीं चलाई —
जब योजनाओं की हड्डियाँ
फाइलों में चटक गईं,
जब बिना बारिश पुल बह गए,
और राशन कार्ड से नाम गायब हो गया।

भोला मुस्कराया,
धीरे से बोला —
"मुझे सज़ा दो,
पर उससे पहले उस नेता से
एक सवाल पूछो —
जो हर साल
देश की जेब में दोनों हाथ डालकर कहता है,
'ये बजट है — विकास का मार्गदर्शन!'"

भोला ने सिर झुकाया,
और हँसा।
क्योंकि अब वो चोर नहीं —
बस एक आँकड़ा है,
"अपराध संख्या 1,387/2025"।

       -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

कटोरा गया किस्मत सो गई

*कटोरा गया, किस्मत सो गई*

राजधानी के किसी वातानुकूलित हॉल में,
जहाँ घोटाले भी डियो की तरह महकते हैं —
सजी थी एक ‘जनसेवी’ महफ़िल,
और मंच पर थीं शहजादी —
बिलकुल उसी अंदाज़ में,
जैसे संसद सत्र से ठीक पहले
रातों-रात नई योजनाएँ "जन्म" लेती हैं।

गले में था हीरों का हार —
इतना भारी,
कि GDP का ग्राफ शर्म से झुक जाए।

भीड़ में थे बैंकर, बिल्डर, ब्रोकर,
कुछ नेता भी थे —
जो कह रहे थे:
"देश बदल रहा है,
और हार इसका सबूत है!"

तालियों की गूंज में
जनता की खामोशी कहीं खो गई थी।

...और तभी —
बिजली चली गई।

चीख़ नहीं निकली,
एक सिलसिला टूटा —
मंच पर थोड़ी हड़बड़ाहट,
कुर्सियों पर थोड़ा खिसकना,
और अंत में एक स्वर —
"कृपया सब शांति बनाए रखें,
यह तकनीकी त्रुटि है,
चोरी नहीं!"

पर जब रोशनी लौटी —
हार ग़ायब!

शहजादी की मुस्कान पिघल चुकी थी,
और PR टीम के चेहरे सूख चुके थे।

वह बोली —
"हम जनता की सेवा में हैं,
हम पारदर्शी हैं।
अगर किसी से भूल हुई हो,
तो कृपया एक कटोरे में
वह...वापस रख दे।
बिना जांच, बिना FIR,
बस भरोसे की बात है।"

कटोरा लाया गया —
गोल, चमकदार,
जैसे चुनावी घोषणापत्र।

हर चेहरा गंभीर,
हर जेब सावधान।

लाइट फिर बंद हुई —
और अब की बार
लंबे इंतज़ार के बाद
जब रोशनी लौटी...

कटोरा भी ग़ायब था।

भीड़ में एक खामोशी थी —
वैसी ही जैसे संसद में
लोकपाल बिल पेश होने से पहले होती है।

किसी ने फुसफुसाया —
"ये चोर नहीं,
योजना आयोग का सलाहकार लगता है!"

दूसरे ने कहा —
"असली प्रतिभा तो वही है
जो जवाबदेही को भी जेब में रख ले।"

PR टीम ने नोट बनाया:
"क्राइसिस को अवसर में बदला जाए,
कटोरा-दिवस मनाने का प्रस्ताव भेजें!"

शहजादी अब भी मुस्कुराने की कोशिश कर रही थी —
बिलकुल वैसी ही
जैसे कोई मंत्री घोटाले के बाद
बचाव में 'टाइपिंग मिस्टेक' कहता है।

और तभी,
कोने में बैठे एक बुज़ुर्ग ने
अख़बार मोड़ते हुए कहा:

"बेटा,
जहाँ सबके हाथ लंबी योजनाओं तक पहुँचते हों,
वहाँ कटोरे क्या, संविधान तक जेब में रखा जाता है।"

           -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

थार थाली और थैली

*थार, थाली और थैली*

जिस दिन गांव को मिला
साल का विकास अनुदान,
उसी शाम
प्रधान जी लौटे
नई चमचमाती थार में।

बोले—
"गांव अब रफ्तार पकड़ेगा!"
और
सिलेंडर, नाली, और टंकी
तीन साल से
कागज़ पर मुस्कुरा रहे हैं।

वो आए थे
घोषणा–पत्र की मोटरसाइकिल पर,
पीछे लटका था
“हर हाथ को काम” का झोला
और हेलमेट की जगह
थामे थे
'विकास' का नारियल।

अब वही मोटरसाइकिल
काफ़िले की फॉर्च्यूनर बन चुकी है।
नारियल फूटा नहीं,
पर जनता की उम्मीदें
हर मोड़ पर फिसल गईं।

जनता की याददाश्त
मोबाइल के बैकअप जैसी है।
हर चुनाव से पहले
"फॉर्मैट" कर दी जाती है।

पिछली बार का झूठ
अब नया सपना बन जाता है,
और हर माइक से निकली
अधूरी बात
अब “विकास यात्रा” कहलाती है।

वो जनता के बीच
मुस्कुराते हुए मिले,
चेहरे पर था
लोकतंत्र का मास्क
और जेब में
तानाशाही का रिमोट।

बोले—
"आप ही हैं असली मालिक!"
और फिर
सारा बजट
अपनों के नाम ट्रांसफर कर दिया।

पंचायत अब
WhatsApp ग्रुप पर चलती है।
सरपंच जी 'admin' हैं,
और विरोध करने वाला
सीधा 'remove' कर दिया जाता है।

ग्रुप का नाम है —
ग्राम विकास 2025
पर उसमें सिर्फ़
Good Morning
और "योजना सफल हुई" जैसे JPEG आते हैं।

बारिश आए या न आए,
बाढ़, सूखा या ओलावृष्टि —
भाषण तय समय पर आते हैं।
सर्दियों में गर्म,
गर्मियों में ठंडे,
मानो भाषण नहीं
AC हों।

हर बार
"आख़िरी बार झूठ बोल रहा हूँ" वाली
सच्चाई दोहराई जाती है।

वोटर को मिलती है—
एक थाली में
— घोषणाएं
— भाषण
— वादे
— और अंत में मिठाई।

बशर्ते वो
पार्टी के झंडे से मैचिंग टोपी पहनकर
लाइन में खड़ा रहे
और
फोटो खिंचवाए।

अब राजनीति
विचारधारा से नहीं,
थैली की धार से चलती है।
कल तक जो दुश्मन थे,
आज 'सम्माननीय सहयोगी' हैं।

दल बदलना
अब अपराध नहीं—
'रणनीतिक कदम' कहलाता है।
सिद्धांत?
वो पिछली सरकार में छूट गया था।

सब कुछ देखकर भी
चुप रह जाना
अब 'समझदारी' है।
क्योंकि सवाल पूछोगे तो
"देशद्रोही" कहे जाओगे।

अब लोकतंत्र
शब्दों में जीवित है,
ज़मीन पर बस
झंडों की रेल है,
और थार की धूल में
गांव कहीं पीछे छूट गया है।

           -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

लोकतंत्र के मच्छर

*लोकतंत्र के मच्छर*

बारिश की पहली बूँद क्या गिरी,
मच्छरों ने घोषणा कर दी-
अब हमारा शासन शुरू !

गली, मोहल्ला, छत, 
चाय की दुकान 
हर जगह झुंड में उतरे,
भिनभिनाते हुए,
जैसे चुनावी रोड शो हो।

कान के पास मंडराए 
बिलकुल उस टीवी एंकर की तरह,
जो चिल्ला कर पूछता है —
बोलो ! राष्ट्र के साथ हो या नहीं ?

कुछ मच्छर तो सरकारी प्रवक्ता हैं —
काटते नहीं,
बस दिन भर आपकी समझ पर सवाल करते हैं।

रात को बिन बुलाए आते हैं
और सुबह WhatsApp पर मैसेज भेजते हैं —
“डेंगू एक अफवाह है,
असल में ये 'राष्ट्रीय सफाई अभियान' है!"
नगरपालिका कहती है —
"हमने धुआँ छोड़ दिया!"
लेकिन मच्छर हँसते हैं —
“हमें धुएँ में चुनावी वादे दिखते हैं!”
जनता पूछती है —
“कब तक ये काटेंगे?”
तो मंत्री मुस्कराकर कहते हैं —
“मच्छर भी भारत के नागरिक हैं,
हम उन्हें नाराज़ नहीं कर सकते।”
कुछ मच्छर घोषणापत्र पर पलते हैं,
हर पाँच साल में नए नारे काटते हैं।
पीठ पर लहराते हैं झंडे,
और हर काट के बाद कहते हैं —
 "ये विकास की सुई है!"

फिर एक रात
एक मच्छर पहुँच गया VIP इलाके में 
सीधे मंत्री जी की नाक पर।
काट लिया —
गौरव, गरिमा, 
और सरकारी सुविधा के बीच।
अगले ही दिन
प्रेस कॉन्फ़्रेंस बुलाई गई 
"यह मच्छर विदेशी एजेंडे का हिस्सा था!"
"यह सिर्फ मच्छर नहीं था —
यह जैविक युद्ध था लोकतंत्र के ख़िलाफ़!"

अब हर गली में
मच्छर-संदिग्ध खोजे जा रहे हैं।
जनता से कहा गया —
 “अगर कोई आपको कान के पास भिनभिनाता दिखे,
तो तुरंत 112 पर कॉल करें।”
"मच्छर-विरोधी ऐप" लॉन्च हुआ,
नाम: "Bhinn-Bhinn Tracker 2.0"
और नियम बनाए गए 
"हर मच्छर को काटने से पहले OTP लेना होगा।"
टीवी पर बहस हुई —
"क्या यह मच्छर विपक्षी विचारधारा से जुड़ा था?"
और स्क्रीन पर लिखा था:
 *“#MosquitoJihad”*

अब जो भी खुजाता है,
उससे पूछा जाता है —
"तुम्हें खुजली क्यों हुई?"
"क्या तुम किसी टूलकिट से जुड़े हो?"
अंततः:
जब मच्छर जनता को काटते हैं,
तो कहा जाता है —
 "ये तो आदत है, सहन करो,
ये देश के विकास की प्रक्रिया है।"
लेकिन जब मच्छर सत्ता को काटता है,
तो रातों-रात योजना बनती है,
बजट पास होता है,
और जनता से कहा जाता है —
 “अब और काटा,
तो तुम भी मच्छर हो!”
और इस तरह —
मच्छर, लोकतंत्र से बड़े हो गए।
अब वे चुनाव नहीं लड़ते,
वो बस हर चेहरे को खुजला कर पूछते हैं —
भिनभिन की आवाज़ सुनी?
तो तय करो —
तुम नागरिक हो या राष्ट्रद्रोही?"

      -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

भगवान ऑफलाइन हैं

*भगवान ऑफलाइन हैं*

भगवान ऑफलाइन हैं।
स्वर्गलोक का नेटवर्क ठप है,
जप-तप, ध्यान सब व्यर्थ हो गया 
“यह नंबर वर्तमान में उपलब्ध नहीं है”
हर दिशा से यही उत्तर आया।

कहीं झुग्गियों में भूख से बिलबिलाते बच्चे
रात में तारे गिनते हैं 
"हे भगवान!" कहकर आँखें मूँदते हैं,
पर ऊपर से कोई उत्तर नहीं आता।

एक माँ,
जिसका बेटा भीड़ की हिंसा में
“राम राम” कहता दम तोड़ गया,
आज भी तुलसी के नीचे बैठ
भगवान से केवल चुप्पी पाती है।

किसी किसान की बेटी
अपने आंगन में लुटती रही 
चिल्लाई, “हे कृष्ण! मेरी लाज बचा लो!”
पर मुरली खामोश रही,
कैलाश शांति में डूबा रहा।

किसी दलित के आंगन में
काली रात उतरी 
वो तड़पता रहा, “महाकाल, देखो न!”
पर त्रिनेत्र बंद रहा,
शिव ध्यानस्थ थे शायद।

कहीं औरत की चीखें
छत फाड़ बाहर आईं,
पर देवताओं की सभा
Noise Cancellation Mode में थी।

मैंने जनेऊ पहना, माथे पर तिलक लगाया,
हाथ जोड़े, आँखें मूँदीं 
सोचा, अब द्वार खुल जाएगा...
पर स्वर्ग से उत्तर आया 
"This Devotee is not in our Database."

माँ मन्नत का धागा बाँधती रही,
बेटी की शादी की आस लिए 
पर लगता है अब कृपा
टोकन नंबर देखकर मिलती है।

अब लगता है 
ईश्वर तक पहुँचने के लिए
आत्मा नहीं,
आधार कार्ड और पासवर्ड चाहिए।

मंदिर गया 
दीप जलाया, घंटा बजाया,
पुजारी ने इशारा किया
“QR Code स्कैन कीजिए,
भगवान अब डिजिटल पेमेंट पर ही कृपा करते हैं।”

एक बाबा मिले, बोले 
“अब दर्शन ‘Online Booking’ से होते हैं,
‘Mukti App’ डाउनलोड कीजिए,
Live Darshan Feed और Premium आरती Slot वहीं मिलेगा।”

मैंने हनुमान चालीसा पढ़ी,
रामरक्षा का पाठ किया 
पर स्वर्ग के स्क्रीन पर लिखा था —
“Server Busy — Try Again Later”

शिव जी Meditation Mode में हैं,
विष्णु जी Auto Reply पर,
ब्रह्मा जी Terms & Conditions लिख रहे हैं।

नारद अब वीणा नहीं बजाते 
वे भक्तों से Feedback Form भरवाते हैं:
“भक्ति कैसी लगी?
1 से 5 स्टार दें,
कृपया सुझाव नीचे लिखें।”

किसी ने कथा YouTube पर सुनी,
फिर कहा — “भगवान, Like कर दिया है,
अब कृपा कर दो, नौकरी लगवा दो।”

अब लोग आरती में Filter लगाते हैं,
लाइक्स और Views से
भक्ति का माप निकलता है।

देवता अब
लड्डू से नहीं,
Follower Count से प्रसन्न होते हैं 
“5 हज़ार पर कृपा,
10 हज़ार पर वरदान।”

साधु बोले 
“अगर कृपा चाहिए तो Trending बनो!
भगवान भी अब वो ही Reel देखते हैं
जो 30 सेकंड में मन मोह ले।”

अब गीता भी
ई-बुक में बिक रही है,
भक्ति अब EMI पर उपलब्ध है,
और मोक्ष के टोकन
Shopping Festival में मिलते हैं।

अब सोच रहा हूँ 
शायद भगवान भी
किसी Customer Support टीम को आदेश दे रहे हों

“जो सच्चे हैं 
उन्हें Priority Queue में डाल दो।
बाकी सबको Hold पर रखो —
और कह दो,
‘Your bhakti is important to us… please wait.’”

     -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

मनहूसियत का वरदान

*हरिहरलाल की कथा – मनहूसियत का वरदान*

हरिहरलाल
एक साधारण नाम
एक असाधारण आदमी
जो सुबह उठते ही
समाचार बन जाता था।

जहाँ जाते,
वहाँ कुछ न कुछ बिगड़ जाता।

पंखा बंद हो जाता था,
बिजली चली जाती थी।
बेटी की सगाई टूट जाती थी,
कुत्ते भौंकने लगते थे—
बिना कारण,
बिना रुके।

लोग कहते—
यह अपशकुन है।
घर की छत से
कपड़े उड़ जाते थे
सिर्फ उसके आने पर।

हर बार
वह प्रयास करता था
साधारण बनने का।
एक सामान्य जीवन जीने का—
जहाँ चीजें काम करें,
लोग मुस्कुराएँ,
और दरवाज़े अपने आप बंद न हों।

लेकिन नहीं—
वह जहाँ था,
मनहूसियत वहीं थी।

एक दिन चौराहे पर
एक बाबा मिले।
सफेद दाढ़ी,
धूप की तरह शांत आँखें।

बोले—
“तू अलग है, बेटा,
तू संकट का स्रोत नहीं,
दूसरे संकटों की दवा है।
तेरे आने से
जो छुपा हुआ है,
वह उजागर हो जाता है।

हरिहरलाल ने पहली बार
अपने भीतर गर्व को महसूस किया—
थोड़ा अजीब था,
पर गर्व था।

अब वह विवाह में जाता है
बारिश तय मानी जाती है।
रेलवे उसे भेजता है
नई ट्रेनों के परीक्षण में—
जहाँ वह बैठा,
वहीं सिस्टम जवाब दे।

और सरकार ने भी
उसे नियुक्त किया है
“आपदा परीक्षण अधिकारी”।

अब लोग कहते हैं—
“जहाँ हरिहरलाल ठीक रहता है,
वहाँ देश सुरक्षित है।”

हरिहरलाल अब मुस्कराता है,
थोड़ा झिझकता है,
पर मन ही मन जानता है—

कि अपशकुन
शायद कोई दोष नहीं,
बल्कि वो आइना है
जिसमें छिपी हुई त्रुटियाँ
झलक जाती हैं।


      -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

सांसे मलबे में दफन है

*साँसें मलबे में दफ़न हैं*

जहाँ गूँजती थी बच्चों की हँसी,
आज वहाँ पसरा है मूक शोक।
जहाँ खिलते थे अक्षर और अरमान,
आज वहाँ बिछा है मलबे का लोक।

प्रार्थना के स्वर अभी थमे नहीं थे,
कि छत भरभराकर गिरी 
और उसके नीचे
कई मासूम साँसें दम तोड़ गईं।

छत नहीं गिरी 
गिरी है हमारी विवेकहीन व्यवस्था।
वो सत्ता,
जो मंदिरों के शिखर चमकाती है,
पर स्कूलों की छतों को
मरम्मत के नाम पर फाइलों में सुला देती है।

गाँव की पुकार थी 
"छत जर्जर है!"
अफसर बोले — "प्रस्ताव भेजा है।"
पंचायत ने कहा — "अनुदान नहीं आया।"
सरकार बोली 
"हम संवेदनशील हैं..."
और तब तक
कई बच्चे माँ के आँचल से छूट चुके थे।

नेताओं के बच्चे विदेशों में पढ़ते हैं,
अफसरों के स्कूलों में डिजिटल क्लास हैं,
और गरीब का बच्चा?
भीगती दीवारों और टपकती छतों के नीचे
सपनों की शवयात्रा निकालता है।

शहरों के चौक चमकते हैं, 
महलों में जश्न सजते हैं,
और एक स्कूल की छत गिरने से
राम और रहमान दोनों मरते हैं।
ना मंदिर जागा, ना मस्जिद बोली,
ना कोई देवता आया, ना संविधान खोला गया।

ये कोई दुर्घटना नहीं 
ये विकास की विडंबना है।
ये हत्या है उस न्याय की
जिसे संविधान ने अधिकार कहा,
और सरकार ने
जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया।

अब क्या होगा?
एक जाँच समिति बनेगी,
मंत्री आएगा, शोक जताएगा,
तस्वीरें खिंचेंगी,
और दो दिन बाद
कोई पूछेगा भी नहीं — "उन बच्चों के नाम क्या थे?"

लेकिन प्रश्न अब भी जीवित है 
कब तक गिरती रहेंगी छतें?
कब तक मलबे में दफ़न होंगे सपने?
कब तक हर मौत को
"दुर्भाग्य" कहकर टाल दिया जाएगा?

उठो भारत!
अब मौन नहीं 
प्रतिरोध चाहिए।
ये लड़ाई स्कूल की नहीं,
आनेवाली पीढ़ी की है।

अगर आज भी तुम सोए रहे,
तो अगली बार गिरनेवाली छत
तुम्हारे अपने घर की हो सकती है।

अब आँसू नहीं — अग्नि चाहिए,
अब मौन नहीं — उद्घोष चाहिए,
अब जाँच नहीं — न्याय चाहिए,
अब शोक नहीं — संकल्प चाहिए।

नियमों की ओट में जो हत्याएँ हो रही हैं,
उन्हें अब इतिहास में नहीं,
जनता की स्मृति में दर्ज होना होगा।

हर गिरती छत, हर दबती साँस,
हर टूटा सपना 
सिर्फ़ आँकड़ा नहीं,
इस लोकतंत्र पर लगा कलंक है।

याद रखो 
अगर आज तुमने आवाज़ नहीं उठाई,
तो कल जब तुम्हारा बच्चा
स्कूल के लिए निकलेगा,
तो तुम्हारी दुआ में
"शिक्षा" से पहले
"सुरक्षा" माँगनी पड़ेगी।

इसलिए अब फैसला तुम्हारा है 
या तो इस तंत्र की चुप्पी से समझौता करो,
या फिर इस चुप्पी को
अपने शब्दों से तोड़ डालो।

अब कविता नहीं 
क्रांति चाहिए।
अब सहानुभूति नहीं 
आंदोलन चाहिए।
अब प्रतीक्षा नहीं 
परिवर्तन चाहिए।

       -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

Monday, July 14, 2025

मच्छर

एक मच्छर आया चुपचाप,
न कोई घोषणा, न कोई बिगुल।
सिर्फ़ एक भिनभिनाहट थी साथ,
और सम्राट का अभेद्य किला डोल गया धूल।

राज्य में तोपें थीं, सैनिक थे,
ड्रोन, डेटा, सैटेलाइट की घेराबंदी।
पर मच्छर ने बाँध तोड़ा,
सत्ता की नींद थी जिसकी बंदी।

मंत्री मौन, वैज्ञानिक स्तब्ध,
सभाएं स्थगित, योजनाएं स्थिर।
एक बूँद रक्त के पीछे,
चौकस व्यवस्था पड़ी अधीर।

जिसने चंद्र पर कदम रखा,
वो जल निकासी भूल गया।
जिसने आकाश बाँध लिया,
वो नाली में मुँह ढाँप कर रो गया।

कागज़ों में विकास बढ़ा था,
मगर ज़मीं पर मच्छर राज कर गया।
जिसे 'तथ्य' कहते थे नेता लोग,
उसे 'भय' ने लील लिया।

ओ मनुष्य! तू किसे जीतता है?
जब एक क्षुद्र जीव तेरी आत्मा को कंपा देता है।
तेरा विज्ञान, तेरा अभिमान,
सिर्फ़ भ्रम की एक परत निकला।

समय पूछता है तुझसे —
"तेरी सभ्यता की कीमत क्या है?"
जब एक मच्छर
तेरे 'विकास' को आईना दिखा देता है।

Thursday, July 10, 2025

वीरगति

*वीरगति प्राप्त योद्धा — अप्सरा विभाग में चयन हेतु प्रस्तुत*

रणभूमि में गिरा शरीर,
भाले से छलनी छाती।
कहते हैं — "वीरगति को प्राप्त हुआ",
जैसे मृत्यु कोई पदवी हो जाती।

स्वर्ग में बजा शंख,
घोष हुआ — “एक और आया है वीर!”
इन्द्रदेव ने पलकें खोलीं,
बोले — “अप्सराओं को सूचना दो धीर!”

अप्सराएँ आईं थाल सजाए,
परिधान में सौंदर्य लहराए।
एक बोली — “क्या बाँसुरी बजाता है?”
दूजी — “संवेदनाओं को समझ पाता है?”
तीसरी ने माथा सिकोड़ा 
“कहीं स्त्री को ‘स्वामिनी’ कहकर तो नहीं बुलाता है?”

योद्धा सकुचाया, 
संकोच में डूबा,कहा 
“मैंने तो बस युद्ध लड़ा था।
धर्म के नाम पर, 
झूठ के लिए भी मरा था।”

अप्सराएँ हँसीं 
“धर्म? कौन-सा? जो सोचने से रोके?”
“या वह, जो स्त्री को बस शोभा माने,
और घर को युद्ध का रणक्षेत्र बनाए?”

“यहाँ वीरता नहीं, विनम्रता चाहिए,”
“ना तलवार की धार, ना सिंह की दहाड़,”
“हमें चाहिए कोई जो पीड़ा पढ़ सके,
ना कि बस रक्त की भाषा समझे बार-बार।”

इन्द्र बोले 
“लेकिन यह वीर है!”
अप्सराएँ बोलीं 
“तो वीरों का शिविर खोलिए,
पति वहाँ से नहीं मिलते,
जहाँ आत्मा घायल हो 
और शरीर वीर कहलाता हो।”

फैसला हुआ 
योद्धा अपात्र।
स्वर्ग ने उसे पुनः पृथ्वी भेजा,
इस निर्देश के साथ 
“प्रेम सीखो, 
फिर वीरता की परीक्षा देना।”


         -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

चाँद टूट रहा है

चाँद टूट रहा है— और उसके विखंडन से उठी धूल आकाश की नहीं, पूरी पृथ्वी की साँसों में भर रही है। धरती अब ग्रह नहीं, एक थकी हुई देह है— जहाँ नदि...