// गिरगिट//
बग़ीचे में एक प्राणी रहता है
कभी पत्तियों सा हरा, कभी धूप सा पीला,
कभी छाल के रंग का गाढ़ा-सा स्याह।
लोग उसे गिरगिट कहते हैं।
गाँव के चौपाल पर चर्चा चली
"यह जीव बड़ा चालाक है,
हर हाल में अपना रंग बदल लेता है।"
एक बूढ़ा मुस्कुराया
"रंग बदलना तो बेगुनाही है बेटा,
असली चालाक वे हैं,
जो मुस्कुराहट बदलकर दर्द छुपा लेते हैं।"
गिरगिट ने कान खुजाते हुए कहा
"भाई, मेरा दोष क्या?
मैं तो सिर्फ़ बचाव में रंग बदलता हूँ,
न मेरा कोई घोषणापत्र है,
न कोई चुनाव चिन्ह।
न मैं हवा का रुख देखकर विचार बदलता हूँ,
न मंच बदलते ही रिश्ते।"
भीड़ हँस दी।
पेड़ पर बैठे कौए ने टहोका मारा
"सच है,
गिरगिट का रंग बदलना तो प्राकृतिक है,
पर इंसानों का रंग बदलना—
कुर्सी की रसायन शाला का कमाल है।"
धीरे-धीरे सब चुप हो गए।
गिरगिट झेंपकर बोला
"मेरी तुलना उनसे मत करो,
मैंने आज तक सिर्फ़ अपनी खाल बदली है,
चरित्र नहीं!"
-देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'
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