Thursday, October 9, 2025

काँच का सिंहासन

 वे निर्वासित प्रतिभाएँ

जिन्हें अब अभिनय के गलियारे छोटे पड़े,

जिन्हें अब लोक-गीत की धुनें नीरस लगीं।

वे आए हैं;

अपने चमकदार चोगे 

और स्व-निर्मित आभा-मंडल के साथ।

फिल्मी नायक, अब राजनीति के महाकाव्य के

'अंतिम हीरो' बनना चाहते हैं,

और गायक, मत-पेटी के राग में

अपना स्वर-माधुर्य घोलना चाहते हैं।

उनकी नज़रों में

चुनाव का टिकट 'अमरत्व' का प्रमाण-पत्र है,

जहाँ यश की भूख और सत्ता का प्रलोभन

एक ही अंधेरे कुएँ में उतरते हैं।

पद मिला— तो देश की देहरी पर नहीं,

उनके 'अहं' के प्रांगण में प्रवेश हुआ।

समस्याएँ? 

वे तो थीं, पुरानी स्क्रिप्ट में!

अब नई पटकथा में,

भुखमरी और मंहगाई एक अमूर्त सांख्यिकी है,

और बेरोज़गारी केवल विरोधियों का प्रलाप।

वे कुर्सी पर नहीं,

एक काँच के सिंहासन पर बिराजते हैं

जो उन्हें हर कोण से

केवल अपना ही विस्तीर्ण अक्स दिखाता है।

वे जनता से नहीं,

केवल अपनी छाया से संवाद करते हैं।

यह आत्ममुग्धता!

यह 'स्व' का वह कैक्टस है,

जो राज्य की उर्वरा भूमि में

अपनी जड़ें जमा चुका है।

जनता की कराह?

वह उनके अट्टालिकाओं तक आते-आते,

एक मंद और अपरिचित ध्वनि बन जाती है।

इतिहास साक्षी है:

वे आए, उन्होंने स्वयं को पूजा,

देश की वेदना को स्मृति-भ्रंश समझा।

और जब उनका अभिनय समाप्त होगा

वे लौट जाएँगे,

पदक और धन लेकर।

पर देश का रंगमंच?

वह वहीं रहेगा

अगले प्रसिद्ध विदूषक की प्रतीक्षा में,

जिसे 'अंधकार' को 'प्रकाश' कहने का

तीव्र मोह है।

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