Tuesday, August 19, 2025

मनहूसियत का वरदान

*हरिहरलाल की कथा – मनहूसियत का वरदान*

हरिहरलाल
एक साधारण नाम
एक असाधारण आदमी
जो सुबह उठते ही
समाचार बन जाता था।

जहाँ जाते,
वहाँ कुछ न कुछ बिगड़ जाता।

पंखा बंद हो जाता था,
बिजली चली जाती थी।
बेटी की सगाई टूट जाती थी,
कुत्ते भौंकने लगते थे—
बिना कारण,
बिना रुके।

लोग कहते—
यह अपशकुन है।
घर की छत से
कपड़े उड़ जाते थे
सिर्फ उसके आने पर।

हर बार
वह प्रयास करता था
साधारण बनने का।
एक सामान्य जीवन जीने का—
जहाँ चीजें काम करें,
लोग मुस्कुराएँ,
और दरवाज़े अपने आप बंद न हों।

लेकिन नहीं—
वह जहाँ था,
मनहूसियत वहीं थी।

एक दिन चौराहे पर
एक बाबा मिले।
सफेद दाढ़ी,
धूप की तरह शांत आँखें।

बोले—
“तू अलग है, बेटा,
तू संकट का स्रोत नहीं,
दूसरे संकटों की दवा है।
तेरे आने से
जो छुपा हुआ है,
वह उजागर हो जाता है।

हरिहरलाल ने पहली बार
अपने भीतर गर्व को महसूस किया—
थोड़ा अजीब था,
पर गर्व था।

अब वह विवाह में जाता है
बारिश तय मानी जाती है।
रेलवे उसे भेजता है
नई ट्रेनों के परीक्षण में—
जहाँ वह बैठा,
वहीं सिस्टम जवाब दे।

और सरकार ने भी
उसे नियुक्त किया है
“आपदा परीक्षण अधिकारी”।

अब लोग कहते हैं—
“जहाँ हरिहरलाल ठीक रहता है,
वहाँ देश सुरक्षित है।”

हरिहरलाल अब मुस्कराता है,
थोड़ा झिझकता है,
पर मन ही मन जानता है—

कि अपशकुन
शायद कोई दोष नहीं,
बल्कि वो आइना है
जिसमें छिपी हुई त्रुटियाँ
झलक जाती हैं।


      -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

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