एक मच्छर आया चुपचाप,
न कोई घोषणा, न कोई बिगुल।
सिर्फ़ एक भिनभिनाहट थी साथ,
और सम्राट का अभेद्य किला डोल गया धूल।
राज्य में तोपें थीं, सैनिक थे,
ड्रोन, डेटा, सैटेलाइट की घेराबंदी।
पर मच्छर ने बाँध तोड़ा,
सत्ता की नींद थी जिसकी बंदी।
मंत्री मौन, वैज्ञानिक स्तब्ध,
सभाएं स्थगित, योजनाएं स्थिर।
एक बूँद रक्त के पीछे,
चौकस व्यवस्था पड़ी अधीर।
जिसने चंद्र पर कदम रखा,
वो जल निकासी भूल गया।
जिसने आकाश बाँध लिया,
वो नाली में मुँह ढाँप कर रो गया।
कागज़ों में विकास बढ़ा था,
मगर ज़मीं पर मच्छर राज कर गया।
जिसे 'तथ्य' कहते थे नेता लोग,
उसे 'भय' ने लील लिया।
ओ मनुष्य! तू किसे जीतता है?
जब एक क्षुद्र जीव तेरी आत्मा को कंपा देता है।
तेरा विज्ञान, तेरा अभिमान,
सिर्फ़ भ्रम की एक परत निकला।
समय पूछता है तुझसे —
"तेरी सभ्यता की कीमत क्या है?"
जब एक मच्छर
तेरे 'विकास' को आईना दिखा देता है।
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