*कटोरा गया, किस्मत सो गई*
राजधानी के किसी वातानुकूलित हॉल में,
जहाँ घोटाले भी डियो की तरह महकते हैं —
सजी थी एक ‘जनसेवी’ महफ़िल,
और मंच पर थीं शहजादी —
बिलकुल उसी अंदाज़ में,
जैसे संसद सत्र से ठीक पहले
रातों-रात नई योजनाएँ "जन्म" लेती हैं।
गले में था हीरों का हार —
इतना भारी,
कि GDP का ग्राफ शर्म से झुक जाए।
भीड़ में थे बैंकर, बिल्डर, ब्रोकर,
कुछ नेता भी थे —
जो कह रहे थे:
"देश बदल रहा है,
और हार इसका सबूत है!"
तालियों की गूंज में
जनता की खामोशी कहीं खो गई थी।
...और तभी —
बिजली चली गई।
चीख़ नहीं निकली,
एक सिलसिला टूटा —
मंच पर थोड़ी हड़बड़ाहट,
कुर्सियों पर थोड़ा खिसकना,
और अंत में एक स्वर —
"कृपया सब शांति बनाए रखें,
यह तकनीकी त्रुटि है,
चोरी नहीं!"
पर जब रोशनी लौटी —
हार ग़ायब!
शहजादी की मुस्कान पिघल चुकी थी,
और PR टीम के चेहरे सूख चुके थे।
वह बोली —
"हम जनता की सेवा में हैं,
हम पारदर्शी हैं।
अगर किसी से भूल हुई हो,
तो कृपया एक कटोरे में
वह...वापस रख दे।
बिना जांच, बिना FIR,
बस भरोसे की बात है।"
कटोरा लाया गया —
गोल, चमकदार,
जैसे चुनावी घोषणापत्र।
हर चेहरा गंभीर,
हर जेब सावधान।
लाइट फिर बंद हुई —
और अब की बार
लंबे इंतज़ार के बाद
जब रोशनी लौटी...
कटोरा भी ग़ायब था।
भीड़ में एक खामोशी थी —
वैसी ही जैसे संसद में
लोकपाल बिल पेश होने से पहले होती है।
किसी ने फुसफुसाया —
"ये चोर नहीं,
योजना आयोग का सलाहकार लगता है!"
दूसरे ने कहा —
"असली प्रतिभा तो वही है
जो जवाबदेही को भी जेब में रख ले।"
PR टीम ने नोट बनाया:
"क्राइसिस को अवसर में बदला जाए,
कटोरा-दिवस मनाने का प्रस्ताव भेजें!"
शहजादी अब भी मुस्कुराने की कोशिश कर रही थी —
बिलकुल वैसी ही
जैसे कोई मंत्री घोटाले के बाद
बचाव में 'टाइपिंग मिस्टेक' कहता है।
और तभी,
कोने में बैठे एक बुज़ुर्ग ने
अख़बार मोड़ते हुए कहा:
"बेटा,
जहाँ सबके हाथ लंबी योजनाओं तक पहुँचते हों,
वहाँ कटोरे क्या, संविधान तक जेब में रखा जाता है।"
-देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'
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