वह चाहता था एक पवित्र भूमि
वह दिन-रात इसी सोच में लगा रहता,
कि यह भूमि एकरंगी हो जाए,
जहाँ मंदिरों की घंटियाँ गूंजें,
और अज़ानों की प्रतिध्वनि
कभी सुनाई न दे।
उसे लगता था –
देश में शांति तभी आएगी,
जब सब एक जैसे दिखेंगे,
एक जैसे सोचेंगे,
और एक ही ईश्वर को पूजेंगे।
भगवान ने शायद सुना भी,
क्योंकि एक दिन सचमुच
देश मुसलमानों से मुक्त हो गया।
पर वह क्या जाने,
मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन
“दूसरा” नहीं,
“स्वयं का मन” होता है।
अब ज़मीन पर वही थे
जिन्होंने मंदिर बनाए थे।
फिर भी मंदिरों के बीच
दीवारें उठने लगीं।
कोई ऊँचा, कोई नीचा,
कोई शुद्ध, कोई अपवित्र—
शांति की जगह
फिर वही शोर।
उसने माथे पर हाथ रख कहा —
“दलितों को कहीं और भेज दो!”
और सचमुच,
इतिहास ने उसकी बात मानी।
दलित चले गए।
पर अब?
जहाँ केवल सवर्ण बचे,
वहाँ भी शांति न आई।
ब्राह्मण बोला – “मंत्र मेरा!”
क्षत्रिय बोला – “शस्त्र मेरा!”
और फिर वही रक्त,
वही गर्व,
वही युद्ध।
थककर उसने परशुराम का आह्वान किया,
“प्रभु, एक बार फिर धरती को
क्षत्रियों से मुक्त कर दो!”
वह भी मान गए।
धरती पर अब केवल ब्राह्मण बचे।
पर भूख भी तो ब्राह्मण थी —
ज्ञान की नहीं, अनाज की।
सो खेत जोते, हल चलाए,
पसीने की बूंदों में ब्रह्म भी भीग गया।
किसी ने कहा – “जो खेती करे, वह शूद्र।”
किसी ने कहा – “जो व्यापार करे, वह वैश्य।”
और देखते ही देखते,
फिर वही चार वर्ण लौट आए।
अब फिर युद्ध हुआ —
मंत्रों का, मंत्रियों का,
धर्म का, धर्माचार्यों का।
जो हारा, वही अधम कहलाया,
जो जीता, वही आर्य।
एक दिन,
उनमें से कुछ लोग
थक गए युद्धों से।
उन्होंने कहा –
“हम एक नया रास्ता बनाएँगे,
जहाँ सब बराबर हों,
जहाँ सिर झुकाकर नहीं,
दिल मिलाकर जिया जाए।”
उन्होंने नियम बनाए —
सामूहिक प्रार्थना के,
रोज़े के, नमाज़ के,
शांति और समर्पण के।
लोगों ने उन्हें नया नाम दिया —
“मुसलमान।”
अब फिर वही दृश्य लौट आया।
फिर वही डर, वही दीवारें,
वही नफरतें।
और वह —
जो आरंभ में सोचता था
कि “अब सब शुद्ध हो जाएँगे,”
देखता रह गया —
कैसे हर शुद्धता
नए अपवित्र की खोज करती है।
उसकी बुद्धि जड़ हो गई,
जैसे पत्थर हो गया वह —
क्योंकि उसे अब समझ आया
कि मनुष्य की सबसे पुरानी प्रार्थना
“हे ईश्वर, मुझे श्रेष्ठ बना”
ही सबसे बड़ा श्राप है।
और धरती ने कहा —
“मैं सबकी थी, सबकी रहूँगी,
पर हर युग में कोई न कोई
मुझे बाँटता रहेगा।
नाम बदल जाएँगे,
धर्म बदल जाएँगे,
पर वह जो बाँटता है —
उसका चेहरा वही रहेगा।”
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