*वीरगति प्राप्त योद्धा — अप्सरा विभाग में चयन हेतु प्रस्तुत*
रणभूमि में गिरा शरीर,
भाले से छलनी छाती।
कहते हैं — "वीरगति को प्राप्त हुआ",
जैसे मृत्यु कोई पदवी हो जाती।
स्वर्ग में बजा शंख,
घोष हुआ — “एक और आया है वीर!”
इन्द्रदेव ने पलकें खोलीं,
बोले — “अप्सराओं को सूचना दो धीर!”
अप्सराएँ आईं थाल सजाए,
परिधान में सौंदर्य लहराए।
एक बोली — “क्या बाँसुरी बजाता है?”
दूजी — “संवेदनाओं को समझ पाता है?”
तीसरी ने माथा सिकोड़ा
“कहीं स्त्री को ‘स्वामिनी’ कहकर तो नहीं बुलाता है?”
योद्धा सकुचाया,
संकोच में डूबा,कहा
“मैंने तो बस युद्ध लड़ा था।
धर्म के नाम पर,
झूठ के लिए भी मरा था।”
अप्सराएँ हँसीं
“धर्म? कौन-सा? जो सोचने से रोके?”
“या वह, जो स्त्री को बस शोभा माने,
और घर को युद्ध का रणक्षेत्र बनाए?”
“यहाँ वीरता नहीं, विनम्रता चाहिए,”
“ना तलवार की धार, ना सिंह की दहाड़,”
“हमें चाहिए कोई जो पीड़ा पढ़ सके,
ना कि बस रक्त की भाषा समझे बार-बार।”
इन्द्र बोले
“लेकिन यह वीर है!”
अप्सराएँ बोलीं
“तो वीरों का शिविर खोलिए,
पति वहाँ से नहीं मिलते,
जहाँ आत्मा घायल हो
और शरीर वीर कहलाता हो।”
फैसला हुआ
योद्धा अपात्र।
स्वर्ग ने उसे पुनः पृथ्वी भेजा,
इस निर्देश के साथ
“प्रेम सीखो,
फिर वीरता की परीक्षा देना।”
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