*थार, थाली और थैली*
जिस दिन गांव को मिला
साल का विकास अनुदान,
उसी शाम
प्रधान जी लौटे
नई चमचमाती थार में।
बोले—
"गांव अब रफ्तार पकड़ेगा!"
और
सिलेंडर, नाली, और टंकी
तीन साल से
कागज़ पर मुस्कुरा रहे हैं।
वो आए थे
घोषणा–पत्र की मोटरसाइकिल पर,
पीछे लटका था
“हर हाथ को काम” का झोला
और हेलमेट की जगह
थामे थे
'विकास' का नारियल।
अब वही मोटरसाइकिल
काफ़िले की फॉर्च्यूनर बन चुकी है।
नारियल फूटा नहीं,
पर जनता की उम्मीदें
हर मोड़ पर फिसल गईं।
जनता की याददाश्त
मोबाइल के बैकअप जैसी है।
हर चुनाव से पहले
"फॉर्मैट" कर दी जाती है।
पिछली बार का झूठ
अब नया सपना बन जाता है,
और हर माइक से निकली
अधूरी बात
अब “विकास यात्रा” कहलाती है।
वो जनता के बीच
मुस्कुराते हुए मिले,
चेहरे पर था
लोकतंत्र का मास्क
और जेब में
तानाशाही का रिमोट।
बोले—
"आप ही हैं असली मालिक!"
और फिर
सारा बजट
अपनों के नाम ट्रांसफर कर दिया।
पंचायत अब
WhatsApp ग्रुप पर चलती है।
सरपंच जी 'admin' हैं,
और विरोध करने वाला
सीधा 'remove' कर दिया जाता है।
ग्रुप का नाम है —
ग्राम विकास 2025
पर उसमें सिर्फ़
Good Morning
और "योजना सफल हुई" जैसे JPEG आते हैं।
बारिश आए या न आए,
बाढ़, सूखा या ओलावृष्टि —
भाषण तय समय पर आते हैं।
सर्दियों में गर्म,
गर्मियों में ठंडे,
मानो भाषण नहीं
AC हों।
हर बार
"आख़िरी बार झूठ बोल रहा हूँ" वाली
सच्चाई दोहराई जाती है।
वोटर को मिलती है—
एक थाली में
— घोषणाएं
— भाषण
— वादे
— और अंत में मिठाई।
बशर्ते वो
पार्टी के झंडे से मैचिंग टोपी पहनकर
लाइन में खड़ा रहे
और
फोटो खिंचवाए।
अब राजनीति
विचारधारा से नहीं,
थैली की धार से चलती है।
कल तक जो दुश्मन थे,
आज 'सम्माननीय सहयोगी' हैं।
दल बदलना
अब अपराध नहीं—
'रणनीतिक कदम' कहलाता है।
सिद्धांत?
वो पिछली सरकार में छूट गया था।
सब कुछ देखकर भी
चुप रह जाना
अब 'समझदारी' है।
क्योंकि सवाल पूछोगे तो
"देशद्रोही" कहे जाओगे।
अब लोकतंत्र
शब्दों में जीवित है,
ज़मीन पर बस
झंडों की रेल है,
और थार की धूल में
गांव कहीं पीछे छूट गया है।
-देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'
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