*जेब में उँगली*
कटघरे में नहीं,
वो खड़ा था अपनी भूख के सामने।
जज की आँखें नहीं थीं —
बस एक फॉर्म था,
FIR नंबर — 347/21।
नाम?
"भोला"।
पता?
"जहाँ रात भर कहीं ठहरने की जगह मिल जाए।"
उसने जेब में हाथ डाला —
न किसी की गरीबी चुराने,
बस थोड़ी गर्मी उधार लेने।
लेकिन जेब में जो था,
वो महज़ नोट नहीं थे —
वो जात वाले काग़ज़ थे,
जिन पर लिखा था:
"इन्फ्लुएंस", "सत्ता", "सरकार"।
हाथ गया नहीं कि
साइरन चीखा,
लाठियाँ बरसीं,
और अगले दिन अख़बार की हेडलाइन बनी —
"एक और जेबकतरा पकड़ा गया!"
मगर किसी चैनल ने
ब्रेकिंग न्यूज़ नहीं चलाई —
जब योजनाओं की हड्डियाँ
फाइलों में चटक गईं,
जब बिना बारिश पुल बह गए,
और राशन कार्ड से नाम गायब हो गया।
भोला मुस्कराया,
धीरे से बोला —
"मुझे सज़ा दो,
पर उससे पहले उस नेता से
एक सवाल पूछो —
जो हर साल
देश की जेब में दोनों हाथ डालकर कहता है,
'ये बजट है — विकास का मार्गदर्शन!'"
भोला ने सिर झुकाया,
और हँसा।
क्योंकि अब वो चोर नहीं —
बस एक आँकड़ा है,
"अपराध संख्या 1,387/2025"।
-देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'
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