चुनाव से कुछ दिन पहले
गांव की गलियों में
मेले-सा हुजूम उतरा।
पहले दिन आए नोटों के बादशाह,
हाथ जोड़ते, मुस्कान फैलाते,
नोट बरसाते ऐसे
जैसे सावन की पहली बौछार।
बोले – “वोट मुझे देना,
अबकी बार किस्मत चमक जाएगी।”
दूसरे दिन राशन का रथ आया,
तेल, दाल, चावल की महक के साथ।
बोले – “हम ही तुम्हारे असली साथी हैं,
भूख अब कभी लौटकर न आएगी।”
तीसरे दिन गूंजा ढोल-नगाड़ा,
बोतलों का पर्व मनाया गया।
गिलास छलके, गीत बजे,
और वादे भी शराब की तरह झागदार निकले।
हर दिन एक नया तमाशा,
कभी साड़ी, कभी घड़ी, कभी कबाब।
गांव वालों के दरवाज़े
बाज़ार की दुकान बन गए।
भोले-भाले गांव वाले
खामोश मुस्कुराते रहे,
जैसे कोई बच्चा
पंडाल का नाटक देखता है।
पर उनकी आँखों में
एक अजीब-सी चमक थी।
जब चुनाव परिणाम आए –
नेताओं के चेहरे सूख गए।
नोट बर्बाद, राशन व्यर्थ,
दारू का नशा काफ़ूर।
ईवीएम से जो आवाज़ निकली
वह रहस्य की तरह गूंजी –
“इस गांव ने वोट किसी दल को नहीं दिया…”
भीड़ सन्नाटे में डूब गई।
नेता हक्के-बक्के,
गांव वाले निर्विकार।
फिर अचानक चौपाल से हंसी उठी –
“हमने तो सब लिया,
पर बटन दबाया
उस प्रतीक पर
जिसे बैलेट पेपर में
कोई खोज भी न पाया।”
किस प्रतीक पर?
किस नाम पर?
यह रहस्य वहीं थम गया…
गांव आज भी मुस्कुरा रहा है,
और नेता आज भी सोच रहे हैं –
“आख़िर वोट गया कहां?”
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