Tuesday, August 19, 2025

सांसे मलबे में दफन है

*साँसें मलबे में दफ़न हैं*

जहाँ गूँजती थी बच्चों की हँसी,
आज वहाँ पसरा है मूक शोक।
जहाँ खिलते थे अक्षर और अरमान,
आज वहाँ बिछा है मलबे का लोक।

प्रार्थना के स्वर अभी थमे नहीं थे,
कि छत भरभराकर गिरी 
और उसके नीचे
कई मासूम साँसें दम तोड़ गईं।

छत नहीं गिरी 
गिरी है हमारी विवेकहीन व्यवस्था।
वो सत्ता,
जो मंदिरों के शिखर चमकाती है,
पर स्कूलों की छतों को
मरम्मत के नाम पर फाइलों में सुला देती है।

गाँव की पुकार थी 
"छत जर्जर है!"
अफसर बोले — "प्रस्ताव भेजा है।"
पंचायत ने कहा — "अनुदान नहीं आया।"
सरकार बोली 
"हम संवेदनशील हैं..."
और तब तक
कई बच्चे माँ के आँचल से छूट चुके थे।

नेताओं के बच्चे विदेशों में पढ़ते हैं,
अफसरों के स्कूलों में डिजिटल क्लास हैं,
और गरीब का बच्चा?
भीगती दीवारों और टपकती छतों के नीचे
सपनों की शवयात्रा निकालता है।

शहरों के चौक चमकते हैं, 
महलों में जश्न सजते हैं,
और एक स्कूल की छत गिरने से
राम और रहमान दोनों मरते हैं।
ना मंदिर जागा, ना मस्जिद बोली,
ना कोई देवता आया, ना संविधान खोला गया।

ये कोई दुर्घटना नहीं 
ये विकास की विडंबना है।
ये हत्या है उस न्याय की
जिसे संविधान ने अधिकार कहा,
और सरकार ने
जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया।

अब क्या होगा?
एक जाँच समिति बनेगी,
मंत्री आएगा, शोक जताएगा,
तस्वीरें खिंचेंगी,
और दो दिन बाद
कोई पूछेगा भी नहीं — "उन बच्चों के नाम क्या थे?"

लेकिन प्रश्न अब भी जीवित है 
कब तक गिरती रहेंगी छतें?
कब तक मलबे में दफ़न होंगे सपने?
कब तक हर मौत को
"दुर्भाग्य" कहकर टाल दिया जाएगा?

उठो भारत!
अब मौन नहीं 
प्रतिरोध चाहिए।
ये लड़ाई स्कूल की नहीं,
आनेवाली पीढ़ी की है।

अगर आज भी तुम सोए रहे,
तो अगली बार गिरनेवाली छत
तुम्हारे अपने घर की हो सकती है।

अब आँसू नहीं — अग्नि चाहिए,
अब मौन नहीं — उद्घोष चाहिए,
अब जाँच नहीं — न्याय चाहिए,
अब शोक नहीं — संकल्प चाहिए।

नियमों की ओट में जो हत्याएँ हो रही हैं,
उन्हें अब इतिहास में नहीं,
जनता की स्मृति में दर्ज होना होगा।

हर गिरती छत, हर दबती साँस,
हर टूटा सपना 
सिर्फ़ आँकड़ा नहीं,
इस लोकतंत्र पर लगा कलंक है।

याद रखो 
अगर आज तुमने आवाज़ नहीं उठाई,
तो कल जब तुम्हारा बच्चा
स्कूल के लिए निकलेगा,
तो तुम्हारी दुआ में
"शिक्षा" से पहले
"सुरक्षा" माँगनी पड़ेगी।

इसलिए अब फैसला तुम्हारा है 
या तो इस तंत्र की चुप्पी से समझौता करो,
या फिर इस चुप्पी को
अपने शब्दों से तोड़ डालो।

अब कविता नहीं 
क्रांति चाहिए।
अब सहानुभूति नहीं 
आंदोलन चाहिए।
अब प्रतीक्षा नहीं 
परिवर्तन चाहिए।

       -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

No comments:

Post a Comment

चाँद टूट रहा है

चाँद टूट रहा है— और उसके विखंडन से उठी धूल आकाश की नहीं, पूरी पृथ्वी की साँसों में भर रही है। धरती अब ग्रह नहीं, एक थकी हुई देह है— जहाँ नदि...