राख का युग
अब कोई शंख नहीं बजता।
ध्वनि है—पर अर्थ से रिक्त,
मानो आकाश में लटका
एक टूटा हुआ नक्षत्र।
कभी बर्फ़ पर उगते सूरज के स्वप्न थे,
अब राख में दबी चिंगारियाँ हैं,
जिन्हें हथेलियों से ढककर
ज्योति का भ्रम बनाया जाता है।
कभी गिरते सिक्के
गौरव और अपमान की भाषा थे,
अब परछाइयाँ ही
माप का एकमात्र पैमाना हैं।
लोग
मृग की तरह
दूर चमकते जल के पीछे भागते हैं।
हर बार प्यासे लौटते हैं,
और फिर भी समझते हैं
कि तृप्त हो चुके हैं।
कभी खेतों में अन्न की बात थी,
आज केवल मंत्रों की धूल उड़ती है।
धूल ! हाँ ऐसी धूल
जो सुनहरी भी लग सकती है
यदि आँखें बंद कर ली जाएँ।
दीवारें थीं
ईंटों से बनी नगरों की।
अब वे खंडहर हैं
जिन पर नारे उगते हैं
जैसे काई।
जनता कठपुतली है,
धागे उसके अपने ही हैं,
पर वह यह भूल जाती है
कि धागे खींचने वाला
कोई और है।
कभी गति की बातें थीं
चक्र, धारा, पंख और पथ।
अब केवल
एक रथ है,
जो पुरानी पटरियों पर
भविष्य का बोझ ढोता है।
महँगाई और बेरोज़गारी के दैत्य
अब सड़कों पर नहीं दिखते,
वे भीड़ के भीतर
देवताओं के मुखौटे पहनकर
मौन जुलूस निकालते हैं।
स्वर्णिम युग के कथन
किसी टूटे हुए पुल पर लिखे
शिलालेख हैं,
जिन्हें हर जुलूस के बाद
नए झंडे ढक देते हैं।
वो संकल्प की अवधि
जो कभी व्रत की तरह सुनाए गई थी
अब
कैलेंडर की पीली पन्नियों में
धूल खाती है।
वे करोड़ों रोजगार के सपने
अब केवल
शून्य में टिके हैं
जहाँ शून्य ही उत्तर है।
धुआँ है,
पर आग दिखाई नहीं देती।
राख है,
पर मृत्यु की गंध दबा दी गई है।
जनता है,
पर आँखें माला फेरती हैं।
और वह
जो कभी प्रतिज्ञाओं का यात्री था,
अब भूलभुलैया का व्यापारी है।
नक्शे बेचता है
जो कहीं नहीं ले जाते।
ऐसा क्यों है?
क्योंकि दीवारें हमेशा ढहती हैं।
सपनों की छत टिक नहीं पाती।
क्योंकि लोग भूख भुला सकते हैं,
पर प्रतीक नहीं।
मरीचिकाएँ
अक्सर
अमृत से भी मीठी लगती हैं।
और क्योंकि
भीड़ प्रश्नों से नहीं,
उत्तरहीन प्रतीकों से तृप्त होती है।
वह अपनी ही परछाईं को
देवता मान लेती है।
और धागों से बँधी कठपुतली
अपनी थिरकन को
स्वतंत्रता समझ लेती है।
जनता जानती है
दैत्य उसके दरवाज़े पर हैं,
पर वह आँखें मूँदकर
मंत्रों की राख को
माथे पर मल लेती है।
जनता समझती है
भूख उसका पीछा कर रही है,
पर वह थाली में पड़े
खाली प्रतीकों को ही
प्रसाद मान लेती है।
जनता देखती है
उसके धागे खिंच रहे हैं,
पर वह नाचते हुए
खुद ही ताली बजाती है।
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