Friday, January 2, 2026

चाँद टूट रहा है

चाँद टूट रहा है—
और उसके विखंडन से उठी धूल
आकाश की नहीं,
पूरी पृथ्वी की साँसों में भर रही है।
धरती अब ग्रह नहीं,
एक थकी हुई देह है—
जहाँ नदियाँ बहना भूल चुकी हैं
और सागर
कीचड़ में बदलकर
अपने ही जल से शर्मिंदा हैं।
उधर एक विमान
निर्लज्ज गति से
मंगल की ओर बढ़ चला है।
उसमें बैठे हैं—
सत्ता की कुर्सियों से चिपके राजनेता,
धर्म को ठेके पर उठाए सौदागर,
पूँजी के कवच में छिपे
मानवता के शिकारी,
मंत्रों और कथाओं को
ढाल बनाए
आस्था के दलाल।
वे पलायन नहीं कर रहे—
वे अपने विस्तार की
नई भूमि खोज रहे हैं।
और उधर मंगल—
लाल नहीं,
भय से निर्वर्ण—
सूर्य की ओर देखता है।
वह पुकारता है—
“हे सूर्य,
इससे पहले कि यह विमान
मेरी मिट्टी को छुए,
मुझे जला दे।
मेरी चट्टानों को भस्म कर,
मेरे आकाश को राख कर दे,
मेरे अस्तित्व को
अग्नि में विलीन कर दे—
मुझे
दूसरी पृथ्वी मत बनाना।”

Friday, December 19, 2025

वह चाहता था एक पवित्र भूमि

वह चाहता था एक पवित्र भूमि

वह दिन-रात इसी सोच में लगा रहता,
कि यह भूमि एकरंगी हो जाए,
जहाँ मंदिरों की घंटियाँ गूंजें,
और अज़ानों की प्रतिध्वनि
कभी सुनाई न दे।

उसे लगता था –
देश में शांति तभी आएगी,
जब सब एक जैसे दिखेंगे,
एक जैसे सोचेंगे,
और एक ही ईश्वर को पूजेंगे।
भगवान ने शायद सुना भी,
क्योंकि एक दिन सचमुच
देश मुसलमानों से मुक्त हो गया।

पर वह क्या जाने,
मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन
“दूसरा” नहीं,
“स्वयं का मन” होता है।

अब ज़मीन पर वही थे
जिन्होंने मंदिर बनाए थे।
फिर भी मंदिरों के बीच
दीवारें उठने लगीं।
कोई ऊँचा, कोई नीचा,
कोई शुद्ध, कोई अपवित्र—
शांति की जगह
फिर वही शोर।

उसने माथे पर हाथ रख कहा —
“दलितों को कहीं और भेज दो!”
और सचमुच,
इतिहास ने उसकी बात मानी।
दलित चले गए।

पर अब?
जहाँ केवल सवर्ण बचे,
वहाँ भी शांति न आई।
ब्राह्मण बोला – “मंत्र मेरा!”
क्षत्रिय बोला – “शस्त्र मेरा!”
और फिर वही रक्त,
वही गर्व,
वही युद्ध।

थककर उसने परशुराम का आह्वान किया,
“प्रभु, एक बार फिर धरती को
क्षत्रियों से मुक्त कर दो!”
वह भी मान गए।
धरती पर अब केवल ब्राह्मण बचे।

पर भूख भी तो ब्राह्मण थी —
ज्ञान की नहीं, अनाज की।
सो खेत जोते, हल चलाए,
पसीने की बूंदों में ब्रह्म भी भीग गया।
किसी ने कहा – “जो खेती करे, वह शूद्र।”
किसी ने कहा – “जो व्यापार करे, वह वैश्य।”
और देखते ही देखते,
फिर वही चार वर्ण लौट आए।

अब फिर युद्ध हुआ —
मंत्रों का, मंत्रियों का,
धर्म का, धर्माचार्यों का।
जो हारा, वही अधम कहलाया,
जो जीता, वही आर्य।

एक दिन,
उनमें से कुछ लोग
थक गए युद्धों से।
उन्होंने कहा –
“हम एक नया रास्ता बनाएँगे,
जहाँ सब बराबर हों,
जहाँ सिर झुकाकर नहीं,
दिल मिलाकर जिया जाए।”

उन्होंने नियम बनाए —
सामूहिक प्रार्थना के,
रोज़े के, नमाज़ के,
शांति और समर्पण के।
लोगों ने उन्हें नया नाम दिया —
“मुसलमान।”

अब फिर वही दृश्य लौट आया।
फिर वही डर, वही दीवारें,
वही नफरतें।
और वह —
जो आरंभ में सोचता था
कि “अब सब शुद्ध हो जाएँगे,”
देखता रह गया —
कैसे हर शुद्धता
नए अपवित्र की खोज करती है।

उसकी बुद्धि जड़ हो गई,
जैसे पत्थर हो गया वह —
क्योंकि उसे अब समझ आया
कि मनुष्य की सबसे पुरानी प्रार्थना
“हे ईश्वर, मुझे श्रेष्ठ बना”
ही सबसे बड़ा श्राप है।

और धरती ने कहा —
“मैं सबकी थी, सबकी रहूँगी,
पर हर युग में कोई न कोई
मुझे बाँटता रहेगा।
नाम बदल जाएँगे,
धर्म बदल जाएँगे,
पर वह जो बाँटता है —
उसका चेहरा वही रहेगा।”

निकाह

मुहल्ले के मोड़ पर
एक घर था
जहाँ पहला निकाह,
फिर दूसरा निकाह,
फिर तीसरा निकाह
यूँ बदलते रहे
जैसे बरसात में गीले कपड़े।

एक जनाब थे
पहले ट्रक हाँकते थे,
अब ज़िम्मेदारियाँ
सड़क की धूल की तरह
हवा में उड़ा देते हैं।

एक बेगम थीं
जिन्हें लगा कि
ख़्याल रखने का हक़
किसी और मुस्कान में ज़्यादा है।
सो उधर चल पड़ीं,
जहाँ पहले से ही
रौनक इतनी थी
कि पाँच बच्चों का झूला
दरवाजे पर झूल रहा था।

फिर क्या था
दोनों तरफ़
नए सपने, नए वादे,
और नए-नए रोने की उम्मीदें।
पुराने दस के दस फूल
सरकारी आँगन में छोड़ दिए गए,
जहाँ “ममता” पोस्टर पर मुस्कुराती है
और बच्चों के कपड़े
दूध के पैकेट की तरह
सरकारी ठप्पे से चलते हैं।

इधर जिन जनाबों को
पहले “घर का सरदार” कहा जाता था,
वो भी अब ताज़ा अध्याय खोल चुके हैं
नया रिश्ता, नई परवरिश,
और शायद नए-नए नाम
गली के स्कूल में दर्ज होते हुए मिल जाएँ।

पर हम?
हम कौन होते हैं कहने वाले?
हमारे हिस्से में तो बस
ताली बजाने का अधिकार बचा है
कभी मंच पर,
कभी मुनादी में,
कभी आँकड़ों में।

कोई चाहे जितने रिश्ते बदले,
चाहे जितने पालने झुलाए,
या छोड़ आए
हम तो बस यही कहेंगे
कि दुनिया की आबादी का अंक
हमारी जेब से थोड़ी भरता है!

इसीलिए
जो चलता रहे चलने दो
और बढ़ते हुए बच्चों की भीड़ को
बस गिनती में जोड़ने दो।

आख़िरकार,
हम कौन बोलने वाले?
हम तो बस रहने वाले
एक ऐसे समाज में
जहाँ ज़िम्मेदारियाँ
अक्सर निकाह के कपड़ों की तरह
बार-बार बदल ली जाती हैं।

      -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

Thursday, October 9, 2025

विश्वगुरु

यह देश 
जहाँ भूख अब आँकड़ों की भाषा बोलती है,
और रोटी 
सरकारी रिपोर्ट की पंक्ति में मर चुकी है।
जहाँ कफ सिरप पीकर मरे बच्चों के गले में
अब भी झुनझुने बँधे हैं 
ताकि दुनिया को लगे,
वे अब भी खेल रहे हैं।

यह वही देश है 
जहाँ न्याय की चौखट पर
जूता गिरता है,
और न्यायाधीश उसे “लोकतांत्रिक असहमति” बताकर
माथे पर रख लेते हैं।
जहाँ सत्य का गला घोंटने के बाद
हर नेता माइक पर कहता है 
“मुझे देश पर गर्व है।”

जहाँ दलित का चेहरा मूत्र से धोया जाता है,
और अपराधी
तीर्थयात्रा पर भेज दिया जाता है
‘संस्कार सुधार’ के नाम पर।

जहाँ स्त्रियाँ
व्रत रखती हैं पति की दीर्घायु के लिए,
और पति रखता है
दूसरी के लिए भविष्य निधि।

जहाँ ढाई साल की बच्ची के साथ
ईश्वर की संतानें खेलती हैं 
और देवता उस समय ध्यान में लीन रहते हैं,
क्योंकि वह ‘धार्मिक उत्सव’ का मौसम होता है।

यह वही देश है 
जहाँ प्रेम करना देशद्रोह है,
जहाँ विवाह से पहले सोचने वाली स्त्री
‘संस्कृति की शत्रु’ कहलाती है।
जहाँ भाषा का लहजा,
वस्त्र का रंग,
भोजन की गंध,
और नाम का उच्चारण
राष्ट्रभक्ति का मापदंड है।

जहाँ मंदिरों की सीढ़ियों पर
नफ़रत की आरती होती है,
और स्कूलों में बच्चे
पहचान का पाठ पढ़ते हैं 
“मैं कौन, तू कौन।”

यह वही देश है 
जहाँ हिमालय की निस्तब्धता में
एक विज्ञानी को बन्द कर दिया गया,
क्योंकि उसने कहा 
“बर्फ़ पिघल रही है।”
शासन ने सोचा 
यह तो राज़ खोल रहा है।
और उसकी चुप्पी को भी
देशद्रोह की भाषा में अनुवादित कर दिया गया।

जहाँ किसान की पीठ
सरकारी कर्ज़ की रसीद बन चुकी है,
और उसकी आत्महत्या 
सांख्यिकी का ‘पाद-टिप्पणी’।

जहाँ कवि जब लिखता है
तो थाने में फोन बजता है,
और पत्रकार का माइक
गिरवी रखा होता है किसी निवेशक के पास।

जहाँ विश्वविद्यालयों के गलियारों में
अब विचार नहीं कैमरे टंगे हैं।
जहाँ हर सवाल
एक प्राथमिकी में बदल जाता है।

यह वही देश है 
जो विश्वगुरु बनने की साधना में
सत्याग्रह को “विघटन”
और विवेक को “अपमान” कहता है।

जहाँ संविधान की आत्मा
हर सुबह नये शपथपत्र में दफ़नाई जाती है,
और हर शाम संसद में
लोकतंत्र की राख पर
“जय श्री…” का नया नारा चढ़ाया जाता है।

जहाँ इतिहास को
भूख के नाम पर भूखा रखा गया है,
और भविष्य को
राष्ट्रभक्ति के तेल में जलाया जा रहा है।

कहो,
अब और क्या शेष है
विश्वगुरु बनने के लिए?
शायद बस इतना 
कि मरता हुआ मनुष्य भी
मरने से पहले कहे 
“मैं भाग्यशाली हूँ,
क्योंकि मैंने इस देश में मरना सीखा।”

काँच का सिंहासन

 वे निर्वासित प्रतिभाएँ

जिन्हें अब अभिनय के गलियारे छोटे पड़े,

जिन्हें अब लोक-गीत की धुनें नीरस लगीं।

वे आए हैं;

अपने चमकदार चोगे 

और स्व-निर्मित आभा-मंडल के साथ।

फिल्मी नायक, अब राजनीति के महाकाव्य के

'अंतिम हीरो' बनना चाहते हैं,

और गायक, मत-पेटी के राग में

अपना स्वर-माधुर्य घोलना चाहते हैं।

उनकी नज़रों में

चुनाव का टिकट 'अमरत्व' का प्रमाण-पत्र है,

जहाँ यश की भूख और सत्ता का प्रलोभन

एक ही अंधेरे कुएँ में उतरते हैं।

पद मिला— तो देश की देहरी पर नहीं,

उनके 'अहं' के प्रांगण में प्रवेश हुआ।

समस्याएँ? 

वे तो थीं, पुरानी स्क्रिप्ट में!

अब नई पटकथा में,

भुखमरी और मंहगाई एक अमूर्त सांख्यिकी है,

और बेरोज़गारी केवल विरोधियों का प्रलाप।

वे कुर्सी पर नहीं,

एक काँच के सिंहासन पर बिराजते हैं

जो उन्हें हर कोण से

केवल अपना ही विस्तीर्ण अक्स दिखाता है।

वे जनता से नहीं,

केवल अपनी छाया से संवाद करते हैं।

यह आत्ममुग्धता!

यह 'स्व' का वह कैक्टस है,

जो राज्य की उर्वरा भूमि में

अपनी जड़ें जमा चुका है।

जनता की कराह?

वह उनके अट्टालिकाओं तक आते-आते,

एक मंद और अपरिचित ध्वनि बन जाती है।

इतिहास साक्षी है:

वे आए, उन्होंने स्वयं को पूजा,

देश की वेदना को स्मृति-भ्रंश समझा।

और जब उनका अभिनय समाप्त होगा

वे लौट जाएँगे,

पदक और धन लेकर।

पर देश का रंगमंच?

वह वहीं रहेगा

अगले प्रसिद्ध विदूषक की प्रतीक्षा में,

जिसे 'अंधकार' को 'प्रकाश' कहने का

तीव्र मोह है।

Sunday, October 5, 2025

पटरी पर

पटरी पर

नेता ने कहा—
“अब इस देश को
पटरी पर लाना
सिर्फ हम ही जानते हैं।”

सभा में शोर उठा,
जैसे शब्द ही समाधान हों,
जैसे वादे ही विकास हों।

पर भीड़ से कोई आम आदमी
धीरे से मुस्कुराया,
उसकी हँसी में छिपी थी
सालों की पीड़ा।

उसने कहा—
“लोगों ने बड़ी मुश्किल से
शौचालय जाना सीखा है,
अब हमें मत उतारो
फिर से पटरी पर।

पटरी हमारे लिए
सिर्फ रेलवे लाइन नहीं,
बल्कि वही पुराना रास्ता है
जहाँ गरिमा खो जाती थी
और बदबू बनती थी
हमारी पहचान।”

उसकी आवाज़ ने
सभा का शोर निगल लिया।
नेता की पटरी और
जनता की ज़िंदगी—
दो समानांतर रेखाएँ हैं,
जो कभी मिलती नहीं,
सिवाय व्यंग्य की कविता में।

Thursday, September 25, 2025

नेक्रोफिलिया सत्ता का लोकगीत

*नेक्रोफिलिक सत्ता का शोकगीत*

व्यवस्था मर चुकी है।
उसकी नब्ज़ में रक्त नहीं,
केवल अभिलेखों की धूल है।
उसकी आँखें
फ़ाइलों के बोझ तले दबकर
काँच जैसी जड़ हो चुकी हैं।

फिर भी,
सत्ता उसकी ठंडी देह पर झुककर
भक्ति का नाटक रचती है।
जैसे मृत देह ही
उसकी सबसे बड़ी कामना हो।

न्याय
जो जीवित आत्मा होना चाहिए था,
अब स्थगनों और तारीख़ों की
लंबी शृंखला है।
हर निर्णय
इतिहास की परतों में दबा
मृत दस्तावेज़ है।

अर्थव्यवस्था
जिसे जीवित प्रवाह होना चाहिए था,
अब आंकड़ों के शवघर में
बंद कर दी गई है।
जीडीपी की हर रेखा
इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम की
एक मरी हुई तरंग है।

समाज
जो प्रश्न पूछता था,
अब नारों और जुलूसों की
गूंगी परेड बन चुका है।
यह भी
मृत देह की तरह है
जिसे रंग-बिरंगे कपड़ों में
ढँककर दिखाया जा रहा है।

और अफसरशाही
वह तो इस शवयात्रा का
मुख्य पुजारी है।
फ़ाइलों के कफन बेचते हुए
हर दस्तख़त की कीमत तय करता है।
भ्रष्टाचार उसका हवन है,
और जनता उसका चढ़ावा।
वह जानता है
कि मुर्दा व्यवस्था
सबसे सुरक्षित है
क्योंकि उसमें विरोध नहीं,
केवल मौन होता है।

यह नेक्रोफिलिक आकर्षण क्यों?
क्योंकि जीवित चीज़ें असहज करती हैं।
वे प्रश्न पूछती हैं,
वे परिवर्तन मांगती हैं।
मुर्दा चीज़ें
सिर्फ़ आकर्षण देती हैं
बिना शर्त, बिना प्रतिरोध।

इसलिए सत्ता और अफसरशाही
जीवित सुधार की पीड़ा से बचकर
मुर्दा व्यवस्था की देह पर झुकते हैं।
वह मृत शरीर उनका सबसे सुरक्षित प्रेम है।
और वे उसी से
सत्ता का अनंत सुख लेते हैं।

दर्शक मंडली मौन खड़ी है।
उनके हाथों में फूल हैं
वे हर गिरते पत्ते को
अर्पण मानते हैं।

यात्री साथ चल रहे हैं,
पर वे दिशा नहीं पूछते।
वे मानते हैं
कि शवयात्रा ही तीर्थ है।

याजक मन्त्र पढ़ते हैं,
पर उनका स्वर रिक्त है।
फिर भी भीड़
हर शून्य को
आशीर्वाद समझ लेती है।

फूल गंध नहीं पहचानते,
केवल धूप के धुएँ से 
भ्रमित होते हैं।
कठपुतली 
अपने ही धागों पर थिरकती है, 
और इसे स्वतंत्रता समझ लेती है।

मृग 
मरीचिका के जल में 
प्यास बुझाता है, 
और मरुस्थल को स्वर्ग कहता है।

दर्शक जानते हैं
कि वे धागों से बँधे हैं,
फिर भी ताली बजाते हैं।
यात्री जानते हैं
कि रास्ता अंधकार की ओर है,
फिर भी दीपक हवा में उठाते हैं।

भीड़
जिसे जीवन चाहिए था,
अब मृत्यु को उत्सव मान चुकी है।
और यही उसका सबसे बड़ा अपराध है।

चाँद टूट रहा है

चाँद टूट रहा है— और उसके विखंडन से उठी धूल आकाश की नहीं, पूरी पृथ्वी की साँसों में भर रही है। धरती अब ग्रह नहीं, एक थकी हुई देह है— जहाँ नदि...