पटरी पर
नेता ने कहा—
“अब इस देश को
पटरी पर लाना
सिर्फ हम ही जानते हैं।”
सभा में शोर उठा,
जैसे शब्द ही समाधान हों,
जैसे वादे ही विकास हों।
पर भीड़ से कोई आम आदमी
धीरे से मुस्कुराया,
उसकी हँसी में छिपी थी
सालों की पीड़ा।
उसने कहा—
“लोगों ने बड़ी मुश्किल से
शौचालय जाना सीखा है,
अब हमें मत उतारो
फिर से पटरी पर।
पटरी हमारे लिए
सिर्फ रेलवे लाइन नहीं,
बल्कि वही पुराना रास्ता है
जहाँ गरिमा खो जाती थी
और बदबू बनती थी
हमारी पहचान।”
उसकी आवाज़ ने
सभा का शोर निगल लिया।
नेता की पटरी और
जनता की ज़िंदगी—
दो समानांतर रेखाएँ हैं,
जो कभी मिलती नहीं,
सिवाय व्यंग्य की कविता में।
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