Tuesday, August 19, 2025

दशानन

*दशानन की आफत आई*

रावण आया पृथ्वी पर, 
बदला युग का रंग,
दस सिर लेकर घूमता, 
छिड़ गई कैसी जंग।
कहता – "मैं तो ज्ञानी था, 
ब्रह्मा से मिला वरदान,
अब तो बच्चे चिढ़ाते, 
कहते  'मल्टीफेस्ड इंसान'!" 

मोबाइल वाला स्टोर गया, 
बोला-"लाओ फोन",
सेल्समैन ने हँस के कहा 
"तुममें असली कौन है
और कौन है 'क्लोन'?"
"दस चेहरों की Face ID, 
हमसे न हो पाए,
Apple बोले – 
'ऐसे केस में सिस्टम ही घबराए!'

कैफे में कॉफी पीने बैठा, 
हुआ बड़ा घमासान,
हर एक सिर ने माँगी चीज़ें,
उड़ा गया मग–प्लान!
एक बोला – "ब्लैक चाहिए",
दूजा बोले – "लट्टे",
तीसरा माँगे ‘शुगर फ्री’, 
बाकी बोले – “कट्टे!!”

गया बैंक खाता खुलवाने, 
बैंक मैनेजर घबराया,
"दस सिग्नेचर कौन करे? 
पहले सिर को लाया?"
"आधार कार्ड एक है या फिर दस?" 
पूछा सब हैरान,
रावण बोला – 
"भइया अब तो, कटवा लूं पहचान?" 

टिंडर ऐप पर आया मैसेज – 
'Hi Handsome Rav !',
लड़की बोली – 
"तू ही था क्या रामायण का 
'बॉस फिनाले राव'?"
"दस-दस दिमाग़ों से क्या तू, 
एक राय बना पाता?"
रावण बोला – "बस दिल एक है, 
बाकी सब तो जाने दाता!" 

पार्लर में कटवाने बाल, 
पहुँचा रावण तेज चाल से,
हैयरड्रेसर बोला –
 “कटिंग होगी टाइम के हिसाब से।”
“हर सिर की अलग स्टाइल हो 
या सबका एक ही टोन?”
रावण बोला – 
"इतना बिल मत बना देना 
कि लेना पड़ जाए लोन।"

शादी करने पहुंचा तो 
पंडित जी घबरा गए,
"दस बार ‘सप्तपदी’ लेंगे? 
दूल्हा खुद हकला गए!"
दुल्हन बोली – 
"एक पति ही है मुश्किल, 
तू दस-दस में बंटा!"
रावण बोला – 
"इन सिरों में बस एक समय में
 एक से ही प्यार जता!"

अंत में बोला दशानन, 
अपना युग अपनी लंका 
ही है मित्र भली,
"इस युग ने तो बुद्धि मुझसे,
 हँसते -हँसते हर ली!"
"ज्ञान रहा ना सम्मान कोई, 
सब पूछें एक ही बात,
दस सिर क्यों हैं तुझ पर,
तू आदम की कौन सी जात"।

             -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

जेब में उंगली

*जेब में उँगली*

कटघरे में नहीं,
वो खड़ा था अपनी भूख के सामने।
जज की आँखें नहीं थीं —
बस एक फॉर्म था,
FIR नंबर — 347/21।

नाम?
"भोला"।
पता?
"जहाँ रात भर कहीं ठहरने की जगह मिल जाए।"

उसने जेब में हाथ डाला —
न किसी की गरीबी चुराने,
बस थोड़ी गर्मी उधार लेने।

लेकिन जेब में जो था,
वो महज़ नोट नहीं थे —
वो जात वाले काग़ज़ थे,
जिन पर लिखा था:
"इन्फ्लुएंस", "सत्ता", "सरकार"।

हाथ गया नहीं कि
साइरन चीखा,
लाठियाँ बरसीं,
और अगले दिन अख़बार की हेडलाइन बनी —
"एक और जेबकतरा पकड़ा गया!"

मगर किसी चैनल ने
ब्रेकिंग न्यूज़ नहीं चलाई —
जब योजनाओं की हड्डियाँ
फाइलों में चटक गईं,
जब बिना बारिश पुल बह गए,
और राशन कार्ड से नाम गायब हो गया।

भोला मुस्कराया,
धीरे से बोला —
"मुझे सज़ा दो,
पर उससे पहले उस नेता से
एक सवाल पूछो —
जो हर साल
देश की जेब में दोनों हाथ डालकर कहता है,
'ये बजट है — विकास का मार्गदर्शन!'"

भोला ने सिर झुकाया,
और हँसा।
क्योंकि अब वो चोर नहीं —
बस एक आँकड़ा है,
"अपराध संख्या 1,387/2025"।

       -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

कटोरा गया किस्मत सो गई

*कटोरा गया, किस्मत सो गई*

राजधानी के किसी वातानुकूलित हॉल में,
जहाँ घोटाले भी डियो की तरह महकते हैं —
सजी थी एक ‘जनसेवी’ महफ़िल,
और मंच पर थीं शहजादी —
बिलकुल उसी अंदाज़ में,
जैसे संसद सत्र से ठीक पहले
रातों-रात नई योजनाएँ "जन्म" लेती हैं।

गले में था हीरों का हार —
इतना भारी,
कि GDP का ग्राफ शर्म से झुक जाए।

भीड़ में थे बैंकर, बिल्डर, ब्रोकर,
कुछ नेता भी थे —
जो कह रहे थे:
"देश बदल रहा है,
और हार इसका सबूत है!"

तालियों की गूंज में
जनता की खामोशी कहीं खो गई थी।

...और तभी —
बिजली चली गई।

चीख़ नहीं निकली,
एक सिलसिला टूटा —
मंच पर थोड़ी हड़बड़ाहट,
कुर्सियों पर थोड़ा खिसकना,
और अंत में एक स्वर —
"कृपया सब शांति बनाए रखें,
यह तकनीकी त्रुटि है,
चोरी नहीं!"

पर जब रोशनी लौटी —
हार ग़ायब!

शहजादी की मुस्कान पिघल चुकी थी,
और PR टीम के चेहरे सूख चुके थे।

वह बोली —
"हम जनता की सेवा में हैं,
हम पारदर्शी हैं।
अगर किसी से भूल हुई हो,
तो कृपया एक कटोरे में
वह...वापस रख दे।
बिना जांच, बिना FIR,
बस भरोसे की बात है।"

कटोरा लाया गया —
गोल, चमकदार,
जैसे चुनावी घोषणापत्र।

हर चेहरा गंभीर,
हर जेब सावधान।

लाइट फिर बंद हुई —
और अब की बार
लंबे इंतज़ार के बाद
जब रोशनी लौटी...

कटोरा भी ग़ायब था।

भीड़ में एक खामोशी थी —
वैसी ही जैसे संसद में
लोकपाल बिल पेश होने से पहले होती है।

किसी ने फुसफुसाया —
"ये चोर नहीं,
योजना आयोग का सलाहकार लगता है!"

दूसरे ने कहा —
"असली प्रतिभा तो वही है
जो जवाबदेही को भी जेब में रख ले।"

PR टीम ने नोट बनाया:
"क्राइसिस को अवसर में बदला जाए,
कटोरा-दिवस मनाने का प्रस्ताव भेजें!"

शहजादी अब भी मुस्कुराने की कोशिश कर रही थी —
बिलकुल वैसी ही
जैसे कोई मंत्री घोटाले के बाद
बचाव में 'टाइपिंग मिस्टेक' कहता है।

और तभी,
कोने में बैठे एक बुज़ुर्ग ने
अख़बार मोड़ते हुए कहा:

"बेटा,
जहाँ सबके हाथ लंबी योजनाओं तक पहुँचते हों,
वहाँ कटोरे क्या, संविधान तक जेब में रखा जाता है।"

           -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

थार थाली और थैली

*थार, थाली और थैली*

जिस दिन गांव को मिला
साल का विकास अनुदान,
उसी शाम
प्रधान जी लौटे
नई चमचमाती थार में।

बोले—
"गांव अब रफ्तार पकड़ेगा!"
और
सिलेंडर, नाली, और टंकी
तीन साल से
कागज़ पर मुस्कुरा रहे हैं।

वो आए थे
घोषणा–पत्र की मोटरसाइकिल पर,
पीछे लटका था
“हर हाथ को काम” का झोला
और हेलमेट की जगह
थामे थे
'विकास' का नारियल।

अब वही मोटरसाइकिल
काफ़िले की फॉर्च्यूनर बन चुकी है।
नारियल फूटा नहीं,
पर जनता की उम्मीदें
हर मोड़ पर फिसल गईं।

जनता की याददाश्त
मोबाइल के बैकअप जैसी है।
हर चुनाव से पहले
"फॉर्मैट" कर दी जाती है।

पिछली बार का झूठ
अब नया सपना बन जाता है,
और हर माइक से निकली
अधूरी बात
अब “विकास यात्रा” कहलाती है।

वो जनता के बीच
मुस्कुराते हुए मिले,
चेहरे पर था
लोकतंत्र का मास्क
और जेब में
तानाशाही का रिमोट।

बोले—
"आप ही हैं असली मालिक!"
और फिर
सारा बजट
अपनों के नाम ट्रांसफर कर दिया।

पंचायत अब
WhatsApp ग्रुप पर चलती है।
सरपंच जी 'admin' हैं,
और विरोध करने वाला
सीधा 'remove' कर दिया जाता है।

ग्रुप का नाम है —
ग्राम विकास 2025
पर उसमें सिर्फ़
Good Morning
और "योजना सफल हुई" जैसे JPEG आते हैं।

बारिश आए या न आए,
बाढ़, सूखा या ओलावृष्टि —
भाषण तय समय पर आते हैं।
सर्दियों में गर्म,
गर्मियों में ठंडे,
मानो भाषण नहीं
AC हों।

हर बार
"आख़िरी बार झूठ बोल रहा हूँ" वाली
सच्चाई दोहराई जाती है।

वोटर को मिलती है—
एक थाली में
— घोषणाएं
— भाषण
— वादे
— और अंत में मिठाई।

बशर्ते वो
पार्टी के झंडे से मैचिंग टोपी पहनकर
लाइन में खड़ा रहे
और
फोटो खिंचवाए।

अब राजनीति
विचारधारा से नहीं,
थैली की धार से चलती है।
कल तक जो दुश्मन थे,
आज 'सम्माननीय सहयोगी' हैं।

दल बदलना
अब अपराध नहीं—
'रणनीतिक कदम' कहलाता है।
सिद्धांत?
वो पिछली सरकार में छूट गया था।

सब कुछ देखकर भी
चुप रह जाना
अब 'समझदारी' है।
क्योंकि सवाल पूछोगे तो
"देशद्रोही" कहे जाओगे।

अब लोकतंत्र
शब्दों में जीवित है,
ज़मीन पर बस
झंडों की रेल है,
और थार की धूल में
गांव कहीं पीछे छूट गया है।

           -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

लोकतंत्र के मच्छर

*लोकतंत्र के मच्छर*

बारिश की पहली बूँद क्या गिरी,
मच्छरों ने घोषणा कर दी-
अब हमारा शासन शुरू !

गली, मोहल्ला, छत, 
चाय की दुकान 
हर जगह झुंड में उतरे,
भिनभिनाते हुए,
जैसे चुनावी रोड शो हो।

कान के पास मंडराए 
बिलकुल उस टीवी एंकर की तरह,
जो चिल्ला कर पूछता है —
बोलो ! राष्ट्र के साथ हो या नहीं ?

कुछ मच्छर तो सरकारी प्रवक्ता हैं —
काटते नहीं,
बस दिन भर आपकी समझ पर सवाल करते हैं।

रात को बिन बुलाए आते हैं
और सुबह WhatsApp पर मैसेज भेजते हैं —
“डेंगू एक अफवाह है,
असल में ये 'राष्ट्रीय सफाई अभियान' है!"
नगरपालिका कहती है —
"हमने धुआँ छोड़ दिया!"
लेकिन मच्छर हँसते हैं —
“हमें धुएँ में चुनावी वादे दिखते हैं!”
जनता पूछती है —
“कब तक ये काटेंगे?”
तो मंत्री मुस्कराकर कहते हैं —
“मच्छर भी भारत के नागरिक हैं,
हम उन्हें नाराज़ नहीं कर सकते।”
कुछ मच्छर घोषणापत्र पर पलते हैं,
हर पाँच साल में नए नारे काटते हैं।
पीठ पर लहराते हैं झंडे,
और हर काट के बाद कहते हैं —
 "ये विकास की सुई है!"

फिर एक रात
एक मच्छर पहुँच गया VIP इलाके में 
सीधे मंत्री जी की नाक पर।
काट लिया —
गौरव, गरिमा, 
और सरकारी सुविधा के बीच।
अगले ही दिन
प्रेस कॉन्फ़्रेंस बुलाई गई 
"यह मच्छर विदेशी एजेंडे का हिस्सा था!"
"यह सिर्फ मच्छर नहीं था —
यह जैविक युद्ध था लोकतंत्र के ख़िलाफ़!"

अब हर गली में
मच्छर-संदिग्ध खोजे जा रहे हैं।
जनता से कहा गया —
 “अगर कोई आपको कान के पास भिनभिनाता दिखे,
तो तुरंत 112 पर कॉल करें।”
"मच्छर-विरोधी ऐप" लॉन्च हुआ,
नाम: "Bhinn-Bhinn Tracker 2.0"
और नियम बनाए गए 
"हर मच्छर को काटने से पहले OTP लेना होगा।"
टीवी पर बहस हुई —
"क्या यह मच्छर विपक्षी विचारधारा से जुड़ा था?"
और स्क्रीन पर लिखा था:
 *“#MosquitoJihad”*

अब जो भी खुजाता है,
उससे पूछा जाता है —
"तुम्हें खुजली क्यों हुई?"
"क्या तुम किसी टूलकिट से जुड़े हो?"
अंततः:
जब मच्छर जनता को काटते हैं,
तो कहा जाता है —
 "ये तो आदत है, सहन करो,
ये देश के विकास की प्रक्रिया है।"
लेकिन जब मच्छर सत्ता को काटता है,
तो रातों-रात योजना बनती है,
बजट पास होता है,
और जनता से कहा जाता है —
 “अब और काटा,
तो तुम भी मच्छर हो!”
और इस तरह —
मच्छर, लोकतंत्र से बड़े हो गए।
अब वे चुनाव नहीं लड़ते,
वो बस हर चेहरे को खुजला कर पूछते हैं —
भिनभिन की आवाज़ सुनी?
तो तय करो —
तुम नागरिक हो या राष्ट्रद्रोही?"

      -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

भगवान ऑफलाइन हैं

*भगवान ऑफलाइन हैं*

भगवान ऑफलाइन हैं।
स्वर्गलोक का नेटवर्क ठप है,
जप-तप, ध्यान सब व्यर्थ हो गया 
“यह नंबर वर्तमान में उपलब्ध नहीं है”
हर दिशा से यही उत्तर आया।

कहीं झुग्गियों में भूख से बिलबिलाते बच्चे
रात में तारे गिनते हैं 
"हे भगवान!" कहकर आँखें मूँदते हैं,
पर ऊपर से कोई उत्तर नहीं आता।

एक माँ,
जिसका बेटा भीड़ की हिंसा में
“राम राम” कहता दम तोड़ गया,
आज भी तुलसी के नीचे बैठ
भगवान से केवल चुप्पी पाती है।

किसी किसान की बेटी
अपने आंगन में लुटती रही 
चिल्लाई, “हे कृष्ण! मेरी लाज बचा लो!”
पर मुरली खामोश रही,
कैलाश शांति में डूबा रहा।

किसी दलित के आंगन में
काली रात उतरी 
वो तड़पता रहा, “महाकाल, देखो न!”
पर त्रिनेत्र बंद रहा,
शिव ध्यानस्थ थे शायद।

कहीं औरत की चीखें
छत फाड़ बाहर आईं,
पर देवताओं की सभा
Noise Cancellation Mode में थी।

मैंने जनेऊ पहना, माथे पर तिलक लगाया,
हाथ जोड़े, आँखें मूँदीं 
सोचा, अब द्वार खुल जाएगा...
पर स्वर्ग से उत्तर आया 
"This Devotee is not in our Database."

माँ मन्नत का धागा बाँधती रही,
बेटी की शादी की आस लिए 
पर लगता है अब कृपा
टोकन नंबर देखकर मिलती है।

अब लगता है 
ईश्वर तक पहुँचने के लिए
आत्मा नहीं,
आधार कार्ड और पासवर्ड चाहिए।

मंदिर गया 
दीप जलाया, घंटा बजाया,
पुजारी ने इशारा किया
“QR Code स्कैन कीजिए,
भगवान अब डिजिटल पेमेंट पर ही कृपा करते हैं।”

एक बाबा मिले, बोले 
“अब दर्शन ‘Online Booking’ से होते हैं,
‘Mukti App’ डाउनलोड कीजिए,
Live Darshan Feed और Premium आरती Slot वहीं मिलेगा।”

मैंने हनुमान चालीसा पढ़ी,
रामरक्षा का पाठ किया 
पर स्वर्ग के स्क्रीन पर लिखा था —
“Server Busy — Try Again Later”

शिव जी Meditation Mode में हैं,
विष्णु जी Auto Reply पर,
ब्रह्मा जी Terms & Conditions लिख रहे हैं।

नारद अब वीणा नहीं बजाते 
वे भक्तों से Feedback Form भरवाते हैं:
“भक्ति कैसी लगी?
1 से 5 स्टार दें,
कृपया सुझाव नीचे लिखें।”

किसी ने कथा YouTube पर सुनी,
फिर कहा — “भगवान, Like कर दिया है,
अब कृपा कर दो, नौकरी लगवा दो।”

अब लोग आरती में Filter लगाते हैं,
लाइक्स और Views से
भक्ति का माप निकलता है।

देवता अब
लड्डू से नहीं,
Follower Count से प्रसन्न होते हैं 
“5 हज़ार पर कृपा,
10 हज़ार पर वरदान।”

साधु बोले 
“अगर कृपा चाहिए तो Trending बनो!
भगवान भी अब वो ही Reel देखते हैं
जो 30 सेकंड में मन मोह ले।”

अब गीता भी
ई-बुक में बिक रही है,
भक्ति अब EMI पर उपलब्ध है,
और मोक्ष के टोकन
Shopping Festival में मिलते हैं।

अब सोच रहा हूँ 
शायद भगवान भी
किसी Customer Support टीम को आदेश दे रहे हों

“जो सच्चे हैं 
उन्हें Priority Queue में डाल दो।
बाकी सबको Hold पर रखो —
और कह दो,
‘Your bhakti is important to us… please wait.’”

     -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

मनहूसियत का वरदान

*हरिहरलाल की कथा – मनहूसियत का वरदान*

हरिहरलाल
एक साधारण नाम
एक असाधारण आदमी
जो सुबह उठते ही
समाचार बन जाता था।

जहाँ जाते,
वहाँ कुछ न कुछ बिगड़ जाता।

पंखा बंद हो जाता था,
बिजली चली जाती थी।
बेटी की सगाई टूट जाती थी,
कुत्ते भौंकने लगते थे—
बिना कारण,
बिना रुके।

लोग कहते—
यह अपशकुन है।
घर की छत से
कपड़े उड़ जाते थे
सिर्फ उसके आने पर।

हर बार
वह प्रयास करता था
साधारण बनने का।
एक सामान्य जीवन जीने का—
जहाँ चीजें काम करें,
लोग मुस्कुराएँ,
और दरवाज़े अपने आप बंद न हों।

लेकिन नहीं—
वह जहाँ था,
मनहूसियत वहीं थी।

एक दिन चौराहे पर
एक बाबा मिले।
सफेद दाढ़ी,
धूप की तरह शांत आँखें।

बोले—
“तू अलग है, बेटा,
तू संकट का स्रोत नहीं,
दूसरे संकटों की दवा है।
तेरे आने से
जो छुपा हुआ है,
वह उजागर हो जाता है।

हरिहरलाल ने पहली बार
अपने भीतर गर्व को महसूस किया—
थोड़ा अजीब था,
पर गर्व था।

अब वह विवाह में जाता है
बारिश तय मानी जाती है।
रेलवे उसे भेजता है
नई ट्रेनों के परीक्षण में—
जहाँ वह बैठा,
वहीं सिस्टम जवाब दे।

और सरकार ने भी
उसे नियुक्त किया है
“आपदा परीक्षण अधिकारी”।

अब लोग कहते हैं—
“जहाँ हरिहरलाल ठीक रहता है,
वहाँ देश सुरक्षित है।”

हरिहरलाल अब मुस्कराता है,
थोड़ा झिझकता है,
पर मन ही मन जानता है—

कि अपशकुन
शायद कोई दोष नहीं,
बल्कि वो आइना है
जिसमें छिपी हुई त्रुटियाँ
झलक जाती हैं।


      -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

सांसे मलबे में दफन है

*साँसें मलबे में दफ़न हैं*

जहाँ गूँजती थी बच्चों की हँसी,
आज वहाँ पसरा है मूक शोक।
जहाँ खिलते थे अक्षर और अरमान,
आज वहाँ बिछा है मलबे का लोक।

प्रार्थना के स्वर अभी थमे नहीं थे,
कि छत भरभराकर गिरी 
और उसके नीचे
कई मासूम साँसें दम तोड़ गईं।

छत नहीं गिरी 
गिरी है हमारी विवेकहीन व्यवस्था।
वो सत्ता,
जो मंदिरों के शिखर चमकाती है,
पर स्कूलों की छतों को
मरम्मत के नाम पर फाइलों में सुला देती है।

गाँव की पुकार थी 
"छत जर्जर है!"
अफसर बोले — "प्रस्ताव भेजा है।"
पंचायत ने कहा — "अनुदान नहीं आया।"
सरकार बोली 
"हम संवेदनशील हैं..."
और तब तक
कई बच्चे माँ के आँचल से छूट चुके थे।

नेताओं के बच्चे विदेशों में पढ़ते हैं,
अफसरों के स्कूलों में डिजिटल क्लास हैं,
और गरीब का बच्चा?
भीगती दीवारों और टपकती छतों के नीचे
सपनों की शवयात्रा निकालता है।

शहरों के चौक चमकते हैं, 
महलों में जश्न सजते हैं,
और एक स्कूल की छत गिरने से
राम और रहमान दोनों मरते हैं।
ना मंदिर जागा, ना मस्जिद बोली,
ना कोई देवता आया, ना संविधान खोला गया।

ये कोई दुर्घटना नहीं 
ये विकास की विडंबना है।
ये हत्या है उस न्याय की
जिसे संविधान ने अधिकार कहा,
और सरकार ने
जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया।

अब क्या होगा?
एक जाँच समिति बनेगी,
मंत्री आएगा, शोक जताएगा,
तस्वीरें खिंचेंगी,
और दो दिन बाद
कोई पूछेगा भी नहीं — "उन बच्चों के नाम क्या थे?"

लेकिन प्रश्न अब भी जीवित है 
कब तक गिरती रहेंगी छतें?
कब तक मलबे में दफ़न होंगे सपने?
कब तक हर मौत को
"दुर्भाग्य" कहकर टाल दिया जाएगा?

उठो भारत!
अब मौन नहीं 
प्रतिरोध चाहिए।
ये लड़ाई स्कूल की नहीं,
आनेवाली पीढ़ी की है।

अगर आज भी तुम सोए रहे,
तो अगली बार गिरनेवाली छत
तुम्हारे अपने घर की हो सकती है।

अब आँसू नहीं — अग्नि चाहिए,
अब मौन नहीं — उद्घोष चाहिए,
अब जाँच नहीं — न्याय चाहिए,
अब शोक नहीं — संकल्प चाहिए।

नियमों की ओट में जो हत्याएँ हो रही हैं,
उन्हें अब इतिहास में नहीं,
जनता की स्मृति में दर्ज होना होगा।

हर गिरती छत, हर दबती साँस,
हर टूटा सपना 
सिर्फ़ आँकड़ा नहीं,
इस लोकतंत्र पर लगा कलंक है।

याद रखो 
अगर आज तुमने आवाज़ नहीं उठाई,
तो कल जब तुम्हारा बच्चा
स्कूल के लिए निकलेगा,
तो तुम्हारी दुआ में
"शिक्षा" से पहले
"सुरक्षा" माँगनी पड़ेगी।

इसलिए अब फैसला तुम्हारा है 
या तो इस तंत्र की चुप्पी से समझौता करो,
या फिर इस चुप्पी को
अपने शब्दों से तोड़ डालो।

अब कविता नहीं 
क्रांति चाहिए।
अब सहानुभूति नहीं 
आंदोलन चाहिए।
अब प्रतीक्षा नहीं 
परिवर्तन चाहिए।

       -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

चाँद टूट रहा है

चाँद टूट रहा है— और उसके विखंडन से उठी धूल आकाश की नहीं, पूरी पृथ्वी की साँसों में भर रही है। धरती अब ग्रह नहीं, एक थकी हुई देह है— जहाँ नदि...