"कोई भूखा न सोए" — एक सरकारी संकल्प
रात के दो बजे,
सरकारी गाड़ी की तेज़ रौशनी
सपनों में डूबी फुटपाथ की ज़िंदगियों को
नींद से झकझोर देती है।
एक अफ़सर उतरता है –
आँखों में आदेश का जोश,
हाथ में फाइल,
और मन में सेवा भाव का दिखावा।
देखता है एक भिखारी,
कंबल में लिपटा, भूख से सिकुड़ा,
नींद में डूबा।
अफ़सर गरजता है:
"तू सो रहा है? और भूखा भी?"
भिखारी कराहता है –
"साहब, भूखा हूँ… पर सोने दे,
सपना देख रहा हूँ — पेट भरा है।"
अफ़सर गम्भीर होता है।
कहता है –
“ऊपर से सख़्त हुक्म है —
कोई भूखा न सोए।”
तो उठ जा…
भूखा रह, पर जाग!
रिपोर्ट में भूख मिट चुकी है।
फिर शुरू हुआ सरकारी उपचार:
भिखारी को लिटाया गया हिसाब-किताब के काग़ज़ों पर,
उसके आँसू पोंछे गए प्रेस विज्ञप्ति से,
और भूख को शांति मिली एक बैठक में।
पूरी रात जागता रहा अफ़सर,
भिखारी को भी जागते रखा।
तस्वीर खींची, समाचार भेजा –
“हमारी व्यवस्था प्रतिबद्ध है —
कोई भूखा न सोए।”
सुबह होते ही बयान जारी हुआ:
एक भिखारी को उठाया गया
कोई भूखा नहीं सोया
लक्ष्य शत-प्रतिशत पूरा
तरक्की तेज़ रफ़्तार पर है
और वो भिखारी…?
अगली रात फिर उसी चौराहे पर था,
पर अब नींद में भी काँपता था –
कहीं फिर कोई न आ जाए
"भूख में मत सोना" का फरमान लेकर।
No comments:
Post a Comment