Thursday, September 25, 2025

नेक्रोफिलिया सत्ता का लोकगीत

*नेक्रोफिलिक सत्ता का शोकगीत*

व्यवस्था मर चुकी है।
उसकी नब्ज़ में रक्त नहीं,
केवल अभिलेखों की धूल है।
उसकी आँखें
फ़ाइलों के बोझ तले दबकर
काँच जैसी जड़ हो चुकी हैं।

फिर भी,
सत्ता उसकी ठंडी देह पर झुककर
भक्ति का नाटक रचती है।
जैसे मृत देह ही
उसकी सबसे बड़ी कामना हो।

न्याय
जो जीवित आत्मा होना चाहिए था,
अब स्थगनों और तारीख़ों की
लंबी शृंखला है।
हर निर्णय
इतिहास की परतों में दबा
मृत दस्तावेज़ है।

अर्थव्यवस्था
जिसे जीवित प्रवाह होना चाहिए था,
अब आंकड़ों के शवघर में
बंद कर दी गई है।
जीडीपी की हर रेखा
इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम की
एक मरी हुई तरंग है।

समाज
जो प्रश्न पूछता था,
अब नारों और जुलूसों की
गूंगी परेड बन चुका है।
यह भी
मृत देह की तरह है
जिसे रंग-बिरंगे कपड़ों में
ढँककर दिखाया जा रहा है।

और अफसरशाही
वह तो इस शवयात्रा का
मुख्य पुजारी है।
फ़ाइलों के कफन बेचते हुए
हर दस्तख़त की कीमत तय करता है।
भ्रष्टाचार उसका हवन है,
और जनता उसका चढ़ावा।
वह जानता है
कि मुर्दा व्यवस्था
सबसे सुरक्षित है
क्योंकि उसमें विरोध नहीं,
केवल मौन होता है।

यह नेक्रोफिलिक आकर्षण क्यों?
क्योंकि जीवित चीज़ें असहज करती हैं।
वे प्रश्न पूछती हैं,
वे परिवर्तन मांगती हैं।
मुर्दा चीज़ें
सिर्फ़ आकर्षण देती हैं
बिना शर्त, बिना प्रतिरोध।

इसलिए सत्ता और अफसरशाही
जीवित सुधार की पीड़ा से बचकर
मुर्दा व्यवस्था की देह पर झुकते हैं।
वह मृत शरीर उनका सबसे सुरक्षित प्रेम है।
और वे उसी से
सत्ता का अनंत सुख लेते हैं।

दर्शक मंडली मौन खड़ी है।
उनके हाथों में फूल हैं
वे हर गिरते पत्ते को
अर्पण मानते हैं।

यात्री साथ चल रहे हैं,
पर वे दिशा नहीं पूछते।
वे मानते हैं
कि शवयात्रा ही तीर्थ है।

याजक मन्त्र पढ़ते हैं,
पर उनका स्वर रिक्त है।
फिर भी भीड़
हर शून्य को
आशीर्वाद समझ लेती है।

फूल गंध नहीं पहचानते,
केवल धूप के धुएँ से 
भ्रमित होते हैं।
कठपुतली 
अपने ही धागों पर थिरकती है, 
और इसे स्वतंत्रता समझ लेती है।

मृग 
मरीचिका के जल में 
प्यास बुझाता है, 
और मरुस्थल को स्वर्ग कहता है।

दर्शक जानते हैं
कि वे धागों से बँधे हैं,
फिर भी ताली बजाते हैं।
यात्री जानते हैं
कि रास्ता अंधकार की ओर है,
फिर भी दीपक हवा में उठाते हैं।

भीड़
जिसे जीवन चाहिए था,
अब मृत्यु को उत्सव मान चुकी है।
और यही उसका सबसे बड़ा अपराध है।

राख का युग

राख का युग

अब कोई शंख नहीं बजता।
ध्वनि है—पर अर्थ से रिक्त,
मानो आकाश में लटका
एक टूटा हुआ नक्षत्र।

कभी बर्फ़ पर उगते सूरज के स्वप्न थे,
अब राख में दबी चिंगारियाँ हैं,
जिन्हें हथेलियों से ढककर
ज्योति का भ्रम बनाया जाता है।

कभी गिरते सिक्के
गौरव और अपमान की भाषा थे,
अब परछाइयाँ ही
माप का एकमात्र पैमाना हैं।

लोग
मृग की तरह
दूर चमकते जल के पीछे भागते हैं।
हर बार प्यासे लौटते हैं,
और फिर भी समझते हैं
कि तृप्त हो चुके हैं।

कभी खेतों में अन्न की बात थी,
आज केवल मंत्रों की धूल उड़ती है।
धूल ! हाँ ऐसी धूल
जो सुनहरी भी लग सकती है
यदि आँखें बंद कर ली जाएँ।

दीवारें थीं
ईंटों से बनी नगरों की।
अब वे खंडहर हैं
जिन पर नारे उगते हैं
जैसे काई।

जनता कठपुतली है,
धागे उसके अपने ही हैं,
पर वह यह भूल जाती है
कि धागे खींचने वाला
कोई और है।

कभी गति की बातें थीं
चक्र, धारा, पंख और पथ।
अब केवल
एक रथ है,
जो पुरानी पटरियों पर
भविष्य का बोझ ढोता है।

महँगाई और बेरोज़गारी के दैत्य
अब सड़कों पर नहीं दिखते,
वे भीड़ के भीतर
देवताओं के मुखौटे पहनकर
मौन जुलूस निकालते हैं।

स्वर्णिम युग के कथन
किसी टूटे हुए पुल पर लिखे
शिलालेख हैं,
जिन्हें हर जुलूस के बाद
नए झंडे ढक देते हैं।

वो संकल्प की अवधि 
जो कभी व्रत की तरह सुनाए गई थी
अब
कैलेंडर की पीली पन्नियों में
धूल खाती है।

वे करोड़ों रोजगार के सपने
अब केवल
शून्य में टिके हैं
जहाँ शून्य ही उत्तर है।

धुआँ है,
पर आग दिखाई नहीं देती।
राख है,
पर मृत्यु की गंध दबा दी गई है।
जनता है,
पर आँखें माला फेरती हैं।

और वह
जो कभी प्रतिज्ञाओं का यात्री था,
अब भूलभुलैया का व्यापारी है।
नक्शे बेचता है
जो कहीं नहीं ले जाते।

ऐसा क्यों है?
क्योंकि दीवारें हमेशा ढहती हैं।
सपनों की छत टिक नहीं पाती।

क्योंकि लोग भूख भुला सकते हैं,
पर प्रतीक नहीं।
मरीचिकाएँ
अक्सर
अमृत से भी मीठी लगती हैं।

और क्योंकि
भीड़ प्रश्नों से नहीं,
उत्तरहीन प्रतीकों से तृप्त होती है।
वह अपनी ही परछाईं को
देवता मान लेती है।
और धागों से बँधी कठपुतली
अपनी थिरकन को
स्वतंत्रता समझ लेती है।

जनता जानती है
दैत्य उसके दरवाज़े पर हैं,
पर वह आँखें मूँदकर
मंत्रों की राख को 
माथे पर मल लेती है।

जनता समझती है
भूख उसका पीछा कर रही है,
पर वह थाली में पड़े
खाली प्रतीकों को ही
प्रसाद मान लेती है।

जनता देखती है
उसके धागे खिंच रहे हैं,
पर वह नाचते हुए
खुद ही ताली बजाती है।

Tuesday, September 2, 2025

चुनाव

चुनाव से कुछ दिन पहले
गांव की गलियों में
मेले-सा हुजूम उतरा।

पहले दिन आए नोटों के बादशाह,
हाथ जोड़ते, मुस्कान फैलाते,
नोट बरसाते ऐसे
जैसे सावन की पहली बौछार।
बोले – “वोट मुझे देना,
अबकी बार किस्मत चमक जाएगी।”

दूसरे दिन राशन का रथ आया,
तेल, दाल, चावल की महक के साथ।
बोले – “हम ही तुम्हारे असली साथी हैं,
भूख अब कभी लौटकर न आएगी।”

तीसरे दिन गूंजा ढोल-नगाड़ा,
बोतलों का पर्व मनाया गया।
गिलास छलके, गीत बजे,
और वादे भी शराब की तरह झागदार निकले।

हर दिन एक नया तमाशा,
कभी साड़ी, कभी घड़ी, कभी कबाब।
गांव वालों के दरवाज़े
बाज़ार की दुकान बन गए।

भोले-भाले गांव वाले
खामोश मुस्कुराते रहे,
जैसे कोई बच्चा
पंडाल का नाटक देखता है।
पर उनकी आँखों में
एक अजीब-सी चमक थी।

जब चुनाव परिणाम आए –
नेताओं के चेहरे सूख गए।
नोट बर्बाद, राशन व्यर्थ,
दारू का नशा काफ़ूर।

ईवीएम से जो आवाज़ निकली
वह रहस्य की तरह गूंजी –
“इस गांव ने वोट किसी दल को नहीं दिया…”

भीड़ सन्नाटे में डूब गई।
नेता हक्के-बक्के,
गांव वाले निर्विकार।

फिर अचानक चौपाल से हंसी उठी –
“हमने तो सब लिया,
पर बटन दबाया
उस प्रतीक पर
जिसे बैलेट पेपर में
कोई खोज भी न पाया।”

किस प्रतीक पर?
किस नाम पर?
यह रहस्य वहीं थम गया…

गांव आज भी मुस्कुरा रहा है,
और नेता आज भी सोच रहे हैं –
“आख़िर वोट गया कहां?”

Monday, September 1, 2025

गिरगिट

// गिरगिट//

बग़ीचे में एक प्राणी रहता है
कभी पत्तियों सा हरा, कभी धूप सा पीला,
कभी छाल के रंग का गाढ़ा-सा स्याह।
लोग उसे गिरगिट कहते हैं।

गाँव के चौपाल पर चर्चा चली
"यह जीव बड़ा चालाक है,
हर हाल में अपना रंग बदल लेता है।"
एक बूढ़ा मुस्कुराया
"रंग बदलना तो बेगुनाही है बेटा,
असली चालाक वे हैं,
जो मुस्कुराहट बदलकर दर्द छुपा लेते हैं।"

गिरगिट ने कान खुजाते हुए कहा
"भाई, मेरा दोष क्या?
मैं तो सिर्फ़ बचाव में रंग बदलता हूँ,
न मेरा कोई घोषणापत्र है,
न कोई चुनाव चिन्ह।
न मैं हवा का रुख देखकर विचार बदलता हूँ,
न मंच बदलते ही रिश्ते।"

भीड़ हँस दी।

पेड़ पर बैठे कौए ने टहोका मारा
"सच है,
गिरगिट का रंग बदलना तो प्राकृतिक है,
पर इंसानों का रंग बदलना—
कुर्सी की रसायन शाला का कमाल है।"

धीरे-धीरे सब चुप हो गए।
गिरगिट झेंपकर बोला
"मेरी तुलना उनसे मत करो,
मैंने आज तक सिर्फ़ अपनी खाल बदली है,
चरित्र नहीं!"

        -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

Tuesday, August 19, 2025

दशानन

*दशानन की आफत आई*

रावण आया पृथ्वी पर, 
बदला युग का रंग,
दस सिर लेकर घूमता, 
छिड़ गई कैसी जंग।
कहता – "मैं तो ज्ञानी था, 
ब्रह्मा से मिला वरदान,
अब तो बच्चे चिढ़ाते, 
कहते  'मल्टीफेस्ड इंसान'!" 

मोबाइल वाला स्टोर गया, 
बोला-"लाओ फोन",
सेल्समैन ने हँस के कहा 
"तुममें असली कौन है
और कौन है 'क्लोन'?"
"दस चेहरों की Face ID, 
हमसे न हो पाए,
Apple बोले – 
'ऐसे केस में सिस्टम ही घबराए!'

कैफे में कॉफी पीने बैठा, 
हुआ बड़ा घमासान,
हर एक सिर ने माँगी चीज़ें,
उड़ा गया मग–प्लान!
एक बोला – "ब्लैक चाहिए",
दूजा बोले – "लट्टे",
तीसरा माँगे ‘शुगर फ्री’, 
बाकी बोले – “कट्टे!!”

गया बैंक खाता खुलवाने, 
बैंक मैनेजर घबराया,
"दस सिग्नेचर कौन करे? 
पहले सिर को लाया?"
"आधार कार्ड एक है या फिर दस?" 
पूछा सब हैरान,
रावण बोला – 
"भइया अब तो, कटवा लूं पहचान?" 

टिंडर ऐप पर आया मैसेज – 
'Hi Handsome Rav !',
लड़की बोली – 
"तू ही था क्या रामायण का 
'बॉस फिनाले राव'?"
"दस-दस दिमाग़ों से क्या तू, 
एक राय बना पाता?"
रावण बोला – "बस दिल एक है, 
बाकी सब तो जाने दाता!" 

पार्लर में कटवाने बाल, 
पहुँचा रावण तेज चाल से,
हैयरड्रेसर बोला –
 “कटिंग होगी टाइम के हिसाब से।”
“हर सिर की अलग स्टाइल हो 
या सबका एक ही टोन?”
रावण बोला – 
"इतना बिल मत बना देना 
कि लेना पड़ जाए लोन।"

शादी करने पहुंचा तो 
पंडित जी घबरा गए,
"दस बार ‘सप्तपदी’ लेंगे? 
दूल्हा खुद हकला गए!"
दुल्हन बोली – 
"एक पति ही है मुश्किल, 
तू दस-दस में बंटा!"
रावण बोला – 
"इन सिरों में बस एक समय में
 एक से ही प्यार जता!"

अंत में बोला दशानन, 
अपना युग अपनी लंका 
ही है मित्र भली,
"इस युग ने तो बुद्धि मुझसे,
 हँसते -हँसते हर ली!"
"ज्ञान रहा ना सम्मान कोई, 
सब पूछें एक ही बात,
दस सिर क्यों हैं तुझ पर,
तू आदम की कौन सी जात"।

             -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

जेब में उंगली

*जेब में उँगली*

कटघरे में नहीं,
वो खड़ा था अपनी भूख के सामने।
जज की आँखें नहीं थीं —
बस एक फॉर्म था,
FIR नंबर — 347/21।

नाम?
"भोला"।
पता?
"जहाँ रात भर कहीं ठहरने की जगह मिल जाए।"

उसने जेब में हाथ डाला —
न किसी की गरीबी चुराने,
बस थोड़ी गर्मी उधार लेने।

लेकिन जेब में जो था,
वो महज़ नोट नहीं थे —
वो जात वाले काग़ज़ थे,
जिन पर लिखा था:
"इन्फ्लुएंस", "सत्ता", "सरकार"।

हाथ गया नहीं कि
साइरन चीखा,
लाठियाँ बरसीं,
और अगले दिन अख़बार की हेडलाइन बनी —
"एक और जेबकतरा पकड़ा गया!"

मगर किसी चैनल ने
ब्रेकिंग न्यूज़ नहीं चलाई —
जब योजनाओं की हड्डियाँ
फाइलों में चटक गईं,
जब बिना बारिश पुल बह गए,
और राशन कार्ड से नाम गायब हो गया।

भोला मुस्कराया,
धीरे से बोला —
"मुझे सज़ा दो,
पर उससे पहले उस नेता से
एक सवाल पूछो —
जो हर साल
देश की जेब में दोनों हाथ डालकर कहता है,
'ये बजट है — विकास का मार्गदर्शन!'"

भोला ने सिर झुकाया,
और हँसा।
क्योंकि अब वो चोर नहीं —
बस एक आँकड़ा है,
"अपराध संख्या 1,387/2025"।

       -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

कटोरा गया किस्मत सो गई

*कटोरा गया, किस्मत सो गई*

राजधानी के किसी वातानुकूलित हॉल में,
जहाँ घोटाले भी डियो की तरह महकते हैं —
सजी थी एक ‘जनसेवी’ महफ़िल,
और मंच पर थीं शहजादी —
बिलकुल उसी अंदाज़ में,
जैसे संसद सत्र से ठीक पहले
रातों-रात नई योजनाएँ "जन्म" लेती हैं।

गले में था हीरों का हार —
इतना भारी,
कि GDP का ग्राफ शर्म से झुक जाए।

भीड़ में थे बैंकर, बिल्डर, ब्रोकर,
कुछ नेता भी थे —
जो कह रहे थे:
"देश बदल रहा है,
और हार इसका सबूत है!"

तालियों की गूंज में
जनता की खामोशी कहीं खो गई थी।

...और तभी —
बिजली चली गई।

चीख़ नहीं निकली,
एक सिलसिला टूटा —
मंच पर थोड़ी हड़बड़ाहट,
कुर्सियों पर थोड़ा खिसकना,
और अंत में एक स्वर —
"कृपया सब शांति बनाए रखें,
यह तकनीकी त्रुटि है,
चोरी नहीं!"

पर जब रोशनी लौटी —
हार ग़ायब!

शहजादी की मुस्कान पिघल चुकी थी,
और PR टीम के चेहरे सूख चुके थे।

वह बोली —
"हम जनता की सेवा में हैं,
हम पारदर्शी हैं।
अगर किसी से भूल हुई हो,
तो कृपया एक कटोरे में
वह...वापस रख दे।
बिना जांच, बिना FIR,
बस भरोसे की बात है।"

कटोरा लाया गया —
गोल, चमकदार,
जैसे चुनावी घोषणापत्र।

हर चेहरा गंभीर,
हर जेब सावधान।

लाइट फिर बंद हुई —
और अब की बार
लंबे इंतज़ार के बाद
जब रोशनी लौटी...

कटोरा भी ग़ायब था।

भीड़ में एक खामोशी थी —
वैसी ही जैसे संसद में
लोकपाल बिल पेश होने से पहले होती है।

किसी ने फुसफुसाया —
"ये चोर नहीं,
योजना आयोग का सलाहकार लगता है!"

दूसरे ने कहा —
"असली प्रतिभा तो वही है
जो जवाबदेही को भी जेब में रख ले।"

PR टीम ने नोट बनाया:
"क्राइसिस को अवसर में बदला जाए,
कटोरा-दिवस मनाने का प्रस्ताव भेजें!"

शहजादी अब भी मुस्कुराने की कोशिश कर रही थी —
बिलकुल वैसी ही
जैसे कोई मंत्री घोटाले के बाद
बचाव में 'टाइपिंग मिस्टेक' कहता है।

और तभी,
कोने में बैठे एक बुज़ुर्ग ने
अख़बार मोड़ते हुए कहा:

"बेटा,
जहाँ सबके हाथ लंबी योजनाओं तक पहुँचते हों,
वहाँ कटोरे क्या, संविधान तक जेब में रखा जाता है।"

           -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

चाँद टूट रहा है

चाँद टूट रहा है— और उसके विखंडन से उठी धूल आकाश की नहीं, पूरी पृथ्वी की साँसों में भर रही है। धरती अब ग्रह नहीं, एक थकी हुई देह है— जहाँ नदि...