*नेक्रोफिलिक सत्ता का शोकगीत*
व्यवस्था मर चुकी है।
उसकी नब्ज़ में रक्त नहीं,
केवल अभिलेखों की धूल है।
उसकी आँखें
फ़ाइलों के बोझ तले दबकर
काँच जैसी जड़ हो चुकी हैं।
फिर भी,
सत्ता उसकी ठंडी देह पर झुककर
भक्ति का नाटक रचती है।
जैसे मृत देह ही
उसकी सबसे बड़ी कामना हो।
न्याय
जो जीवित आत्मा होना चाहिए था,
अब स्थगनों और तारीख़ों की
लंबी शृंखला है।
हर निर्णय
इतिहास की परतों में दबा
मृत दस्तावेज़ है।
अर्थव्यवस्था
जिसे जीवित प्रवाह होना चाहिए था,
अब आंकड़ों के शवघर में
बंद कर दी गई है।
जीडीपी की हर रेखा
इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम की
एक मरी हुई तरंग है।
समाज
जो प्रश्न पूछता था,
अब नारों और जुलूसों की
गूंगी परेड बन चुका है।
यह भी
मृत देह की तरह है
जिसे रंग-बिरंगे कपड़ों में
ढँककर दिखाया जा रहा है।
और अफसरशाही
वह तो इस शवयात्रा का
मुख्य पुजारी है।
फ़ाइलों के कफन बेचते हुए
हर दस्तख़त की कीमत तय करता है।
भ्रष्टाचार उसका हवन है,
और जनता उसका चढ़ावा।
वह जानता है
कि मुर्दा व्यवस्था
सबसे सुरक्षित है
क्योंकि उसमें विरोध नहीं,
केवल मौन होता है।
यह नेक्रोफिलिक आकर्षण क्यों?
क्योंकि जीवित चीज़ें असहज करती हैं।
वे प्रश्न पूछती हैं,
वे परिवर्तन मांगती हैं।
मुर्दा चीज़ें
सिर्फ़ आकर्षण देती हैं
बिना शर्त, बिना प्रतिरोध।
इसलिए सत्ता और अफसरशाही
जीवित सुधार की पीड़ा से बचकर
मुर्दा व्यवस्था की देह पर झुकते हैं।
वह मृत शरीर उनका सबसे सुरक्षित प्रेम है।
और वे उसी से
सत्ता का अनंत सुख लेते हैं।
दर्शक मंडली मौन खड़ी है।
उनके हाथों में फूल हैं
वे हर गिरते पत्ते को
अर्पण मानते हैं।
यात्री साथ चल रहे हैं,
पर वे दिशा नहीं पूछते।
वे मानते हैं
कि शवयात्रा ही तीर्थ है।
याजक मन्त्र पढ़ते हैं,
पर उनका स्वर रिक्त है।
फिर भी भीड़
हर शून्य को
आशीर्वाद समझ लेती है।
फूल गंध नहीं पहचानते,
केवल धूप के धुएँ से
भ्रमित होते हैं।
कठपुतली
अपने ही धागों पर थिरकती है,
और इसे स्वतंत्रता समझ लेती है।
मृग
मरीचिका के जल में
प्यास बुझाता है,
और मरुस्थल को स्वर्ग कहता है।
दर्शक जानते हैं
कि वे धागों से बँधे हैं,
फिर भी ताली बजाते हैं।
यात्री जानते हैं
कि रास्ता अंधकार की ओर है,
फिर भी दीपक हवा में उठाते हैं।
भीड़
जिसे जीवन चाहिए था,
अब मृत्यु को उत्सव मान चुकी है।
और यही उसका सबसे बड़ा अपराध है।