Monday, July 14, 2025

मच्छर

एक मच्छर आया चुपचाप,
न कोई घोषणा, न कोई बिगुल।
सिर्फ़ एक भिनभिनाहट थी साथ,
और सम्राट का अभेद्य किला डोल गया धूल।

राज्य में तोपें थीं, सैनिक थे,
ड्रोन, डेटा, सैटेलाइट की घेराबंदी।
पर मच्छर ने बाँध तोड़ा,
सत्ता की नींद थी जिसकी बंदी।

मंत्री मौन, वैज्ञानिक स्तब्ध,
सभाएं स्थगित, योजनाएं स्थिर।
एक बूँद रक्त के पीछे,
चौकस व्यवस्था पड़ी अधीर।

जिसने चंद्र पर कदम रखा,
वो जल निकासी भूल गया।
जिसने आकाश बाँध लिया,
वो नाली में मुँह ढाँप कर रो गया।

कागज़ों में विकास बढ़ा था,
मगर ज़मीं पर मच्छर राज कर गया।
जिसे 'तथ्य' कहते थे नेता लोग,
उसे 'भय' ने लील लिया।

ओ मनुष्य! तू किसे जीतता है?
जब एक क्षुद्र जीव तेरी आत्मा को कंपा देता है।
तेरा विज्ञान, तेरा अभिमान,
सिर्फ़ भ्रम की एक परत निकला।

समय पूछता है तुझसे —
"तेरी सभ्यता की कीमत क्या है?"
जब एक मच्छर
तेरे 'विकास' को आईना दिखा देता है।

Thursday, July 10, 2025

वीरगति

*वीरगति प्राप्त योद्धा — अप्सरा विभाग में चयन हेतु प्रस्तुत*

रणभूमि में गिरा शरीर,
भाले से छलनी छाती।
कहते हैं — "वीरगति को प्राप्त हुआ",
जैसे मृत्यु कोई पदवी हो जाती।

स्वर्ग में बजा शंख,
घोष हुआ — “एक और आया है वीर!”
इन्द्रदेव ने पलकें खोलीं,
बोले — “अप्सराओं को सूचना दो धीर!”

अप्सराएँ आईं थाल सजाए,
परिधान में सौंदर्य लहराए।
एक बोली — “क्या बाँसुरी बजाता है?”
दूजी — “संवेदनाओं को समझ पाता है?”
तीसरी ने माथा सिकोड़ा 
“कहीं स्त्री को ‘स्वामिनी’ कहकर तो नहीं बुलाता है?”

योद्धा सकुचाया, 
संकोच में डूबा,कहा 
“मैंने तो बस युद्ध लड़ा था।
धर्म के नाम पर, 
झूठ के लिए भी मरा था।”

अप्सराएँ हँसीं 
“धर्म? कौन-सा? जो सोचने से रोके?”
“या वह, जो स्त्री को बस शोभा माने,
और घर को युद्ध का रणक्षेत्र बनाए?”

“यहाँ वीरता नहीं, विनम्रता चाहिए,”
“ना तलवार की धार, ना सिंह की दहाड़,”
“हमें चाहिए कोई जो पीड़ा पढ़ सके,
ना कि बस रक्त की भाषा समझे बार-बार।”

इन्द्र बोले 
“लेकिन यह वीर है!”
अप्सराएँ बोलीं 
“तो वीरों का शिविर खोलिए,
पति वहाँ से नहीं मिलते,
जहाँ आत्मा घायल हो 
और शरीर वीर कहलाता हो।”

फैसला हुआ 
योद्धा अपात्र।
स्वर्ग ने उसे पुनः पृथ्वी भेजा,
इस निर्देश के साथ 
“प्रेम सीखो, 
फिर वीरता की परीक्षा देना।”


         -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

मनहूसियत

*हरिहरलाल की कथा – मनहूसियत का वरदान*

हरिहरलाल
एक साधारण नाम
एक असाधारण आदमी
जो सुबह उठते ही
समाचार बन जाता था।

जहाँ जाते,
वहाँ कुछ न कुछ बिगड़ जाता।

पंखा बंद हो जाता था,
बिजली चली जाती थी।
बेटी की सगाई टूट जाती थी,
कुत्ते भौंकने लगते थे—
बिना कारण,
बिना रुके।

लोग कहते—
यह अपशकुन है।
घर की छत से
कपड़े उड़ जाते थे
सिर्फ उसके आने पर।

हर बार
वह प्रयास करता था
साधारण बनने का।
एक सामान्य जीवन जीने का—
जहाँ चीजें काम करें,
लोग मुस्कुराएँ,
और दरवाज़े अपने आप बंद न हों।

लेकिन नहीं—
वह जहाँ था,
मनहूसियत वहीं थी।

एक दिन चौराहे पर
एक बाबा मिले।
सफेद दाढ़ी,
धूप की तरह शांत आँखें।

बोले—
“तू अलग है, बेटा,
तू संकट का स्रोत नहीं,
दूसरे संकटों की दवा है।
तेरे आने से
जो छुपा हुआ है,
वह उजागर हो जाता है।

हरिहरलाल ने पहली बार
अपने भीतर गर्व को महसूस किया—
थोड़ा अजीब था,
पर गर्व था।

अब वह विवाह में जाता है
बारिश तय मानी जाती है।
रेलवे उसे भेजता है
नई ट्रेनों के परीक्षण में—
जहाँ वह बैठा,
वहीं सिस्टम जवाब दे।

और सरकार ने भी
उसे नियुक्त किया है
“आपदा परीक्षण अधिकारी”।

अब लोग कहते हैं—
“जहाँ हरिहरलाल ठीक रहता है,
वहाँ देश सुरक्षित है।”

हरिहरलाल अब मुस्कराता है,
थोड़ा झिझकता है,
पर मन ही मन जानता है—

कि अपशकुन
शायद कोई दोष नहीं,
बल्कि वो आइना है
जिसमें छिपी हुई त्रुटियाँ
झलक जाती हैं।


      -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

Tuesday, July 8, 2025

कोई भूखा न सोए

"कोई भूखा न सोए" — एक सरकारी संकल्प

रात के दो बजे,
सरकारी गाड़ी की तेज़ रौशनी
सपनों में डूबी फुटपाथ की ज़िंदगियों को
नींद से झकझोर देती है।

एक अफ़सर उतरता है –
आँखों में आदेश का जोश,
हाथ में फाइल,
और मन में सेवा भाव का दिखावा।

देखता है एक भिखारी,
कंबल में लिपटा, भूख से सिकुड़ा,
नींद में डूबा।

अफ़सर गरजता है:
"तू सो रहा है? और भूखा भी?"
भिखारी कराहता है –
"साहब, भूखा हूँ… पर सोने दे,
सपना देख रहा हूँ — पेट भरा है।"

अफ़सर गम्भीर होता है।
कहता है –
“ऊपर से सख़्त हुक्म है —
कोई भूखा न सोए।”
तो उठ जा…
भूखा रह, पर जाग!
रिपोर्ट में भूख मिट चुकी है।

फिर शुरू हुआ सरकारी उपचार:
भिखारी को लिटाया गया हिसाब-किताब के काग़ज़ों पर,
उसके आँसू पोंछे गए प्रेस विज्ञप्ति से,
और भूख को शांति मिली एक बैठक में।

पूरी रात जागता रहा अफ़सर,
भिखारी को भी जागते रखा।
तस्वीर खींची, समाचार भेजा –
“हमारी व्यवस्था प्रतिबद्ध है —
कोई भूखा न सोए।”

सुबह होते ही बयान जारी हुआ:
एक भिखारी को उठाया गया
कोई भूखा नहीं सोया
लक्ष्य शत-प्रतिशत पूरा
 तरक्की तेज़ रफ़्तार पर है

और वो भिखारी…?
अगली रात फिर उसी चौराहे पर था,
पर अब नींद में भी काँपता था –
कहीं फिर कोई न आ जाए
"भूख में मत सोना" का फरमान लेकर।

        -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

चाँद टूट रहा है

चाँद टूट रहा है— और उसके विखंडन से उठी धूल आकाश की नहीं, पूरी पृथ्वी की साँसों में भर रही है। धरती अब ग्रह नहीं, एक थकी हुई देह है— जहाँ नदि...