Thursday, October 9, 2025

विश्वगुरु

यह देश 
जहाँ भूख अब आँकड़ों की भाषा बोलती है,
और रोटी 
सरकारी रिपोर्ट की पंक्ति में मर चुकी है।
जहाँ कफ सिरप पीकर मरे बच्चों के गले में
अब भी झुनझुने बँधे हैं 
ताकि दुनिया को लगे,
वे अब भी खेल रहे हैं।

यह वही देश है 
जहाँ न्याय की चौखट पर
जूता गिरता है,
और न्यायाधीश उसे “लोकतांत्रिक असहमति” बताकर
माथे पर रख लेते हैं।
जहाँ सत्य का गला घोंटने के बाद
हर नेता माइक पर कहता है 
“मुझे देश पर गर्व है।”

जहाँ दलित का चेहरा मूत्र से धोया जाता है,
और अपराधी
तीर्थयात्रा पर भेज दिया जाता है
‘संस्कार सुधार’ के नाम पर।

जहाँ स्त्रियाँ
व्रत रखती हैं पति की दीर्घायु के लिए,
और पति रखता है
दूसरी के लिए भविष्य निधि।

जहाँ ढाई साल की बच्ची के साथ
ईश्वर की संतानें खेलती हैं 
और देवता उस समय ध्यान में लीन रहते हैं,
क्योंकि वह ‘धार्मिक उत्सव’ का मौसम होता है।

यह वही देश है 
जहाँ प्रेम करना देशद्रोह है,
जहाँ विवाह से पहले सोचने वाली स्त्री
‘संस्कृति की शत्रु’ कहलाती है।
जहाँ भाषा का लहजा,
वस्त्र का रंग,
भोजन की गंध,
और नाम का उच्चारण
राष्ट्रभक्ति का मापदंड है।

जहाँ मंदिरों की सीढ़ियों पर
नफ़रत की आरती होती है,
और स्कूलों में बच्चे
पहचान का पाठ पढ़ते हैं 
“मैं कौन, तू कौन।”

यह वही देश है 
जहाँ हिमालय की निस्तब्धता में
एक विज्ञानी को बन्द कर दिया गया,
क्योंकि उसने कहा 
“बर्फ़ पिघल रही है।”
शासन ने सोचा 
यह तो राज़ खोल रहा है।
और उसकी चुप्पी को भी
देशद्रोह की भाषा में अनुवादित कर दिया गया।

जहाँ किसान की पीठ
सरकारी कर्ज़ की रसीद बन चुकी है,
और उसकी आत्महत्या 
सांख्यिकी का ‘पाद-टिप्पणी’।

जहाँ कवि जब लिखता है
तो थाने में फोन बजता है,
और पत्रकार का माइक
गिरवी रखा होता है किसी निवेशक के पास।

जहाँ विश्वविद्यालयों के गलियारों में
अब विचार नहीं कैमरे टंगे हैं।
जहाँ हर सवाल
एक प्राथमिकी में बदल जाता है।

यह वही देश है 
जो विश्वगुरु बनने की साधना में
सत्याग्रह को “विघटन”
और विवेक को “अपमान” कहता है।

जहाँ संविधान की आत्मा
हर सुबह नये शपथपत्र में दफ़नाई जाती है,
और हर शाम संसद में
लोकतंत्र की राख पर
“जय श्री…” का नया नारा चढ़ाया जाता है।

जहाँ इतिहास को
भूख के नाम पर भूखा रखा गया है,
और भविष्य को
राष्ट्रभक्ति के तेल में जलाया जा रहा है।

कहो,
अब और क्या शेष है
विश्वगुरु बनने के लिए?
शायद बस इतना 
कि मरता हुआ मनुष्य भी
मरने से पहले कहे 
“मैं भाग्यशाली हूँ,
क्योंकि मैंने इस देश में मरना सीखा।”

काँच का सिंहासन

 वे निर्वासित प्रतिभाएँ

जिन्हें अब अभिनय के गलियारे छोटे पड़े,

जिन्हें अब लोक-गीत की धुनें नीरस लगीं।

वे आए हैं;

अपने चमकदार चोगे 

और स्व-निर्मित आभा-मंडल के साथ।

फिल्मी नायक, अब राजनीति के महाकाव्य के

'अंतिम हीरो' बनना चाहते हैं,

और गायक, मत-पेटी के राग में

अपना स्वर-माधुर्य घोलना चाहते हैं।

उनकी नज़रों में

चुनाव का टिकट 'अमरत्व' का प्रमाण-पत्र है,

जहाँ यश की भूख और सत्ता का प्रलोभन

एक ही अंधेरे कुएँ में उतरते हैं।

पद मिला— तो देश की देहरी पर नहीं,

उनके 'अहं' के प्रांगण में प्रवेश हुआ।

समस्याएँ? 

वे तो थीं, पुरानी स्क्रिप्ट में!

अब नई पटकथा में,

भुखमरी और मंहगाई एक अमूर्त सांख्यिकी है,

और बेरोज़गारी केवल विरोधियों का प्रलाप।

वे कुर्सी पर नहीं,

एक काँच के सिंहासन पर बिराजते हैं

जो उन्हें हर कोण से

केवल अपना ही विस्तीर्ण अक्स दिखाता है।

वे जनता से नहीं,

केवल अपनी छाया से संवाद करते हैं।

यह आत्ममुग्धता!

यह 'स्व' का वह कैक्टस है,

जो राज्य की उर्वरा भूमि में

अपनी जड़ें जमा चुका है।

जनता की कराह?

वह उनके अट्टालिकाओं तक आते-आते,

एक मंद और अपरिचित ध्वनि बन जाती है।

इतिहास साक्षी है:

वे आए, उन्होंने स्वयं को पूजा,

देश की वेदना को स्मृति-भ्रंश समझा।

और जब उनका अभिनय समाप्त होगा

वे लौट जाएँगे,

पदक और धन लेकर।

पर देश का रंगमंच?

वह वहीं रहेगा

अगले प्रसिद्ध विदूषक की प्रतीक्षा में,

जिसे 'अंधकार' को 'प्रकाश' कहने का

तीव्र मोह है।

Sunday, October 5, 2025

पटरी पर

पटरी पर

नेता ने कहा—
“अब इस देश को
पटरी पर लाना
सिर्फ हम ही जानते हैं।”

सभा में शोर उठा,
जैसे शब्द ही समाधान हों,
जैसे वादे ही विकास हों।

पर भीड़ से कोई आम आदमी
धीरे से मुस्कुराया,
उसकी हँसी में छिपी थी
सालों की पीड़ा।

उसने कहा—
“लोगों ने बड़ी मुश्किल से
शौचालय जाना सीखा है,
अब हमें मत उतारो
फिर से पटरी पर।

पटरी हमारे लिए
सिर्फ रेलवे लाइन नहीं,
बल्कि वही पुराना रास्ता है
जहाँ गरिमा खो जाती थी
और बदबू बनती थी
हमारी पहचान।”

उसकी आवाज़ ने
सभा का शोर निगल लिया।
नेता की पटरी और
जनता की ज़िंदगी—
दो समानांतर रेखाएँ हैं,
जो कभी मिलती नहीं,
सिवाय व्यंग्य की कविता में।

चाँद टूट रहा है

चाँद टूट रहा है— और उसके विखंडन से उठी धूल आकाश की नहीं, पूरी पृथ्वी की साँसों में भर रही है। धरती अब ग्रह नहीं, एक थकी हुई देह है— जहाँ नदि...