Friday, January 2, 2026

चाँद टूट रहा है

चाँद टूट रहा है—
और उसके विखंडन से उठी धूल
आकाश की नहीं,
पूरी पृथ्वी की साँसों में भर रही है।
धरती अब ग्रह नहीं,
एक थकी हुई देह है—
जहाँ नदियाँ बहना भूल चुकी हैं
और सागर
कीचड़ में बदलकर
अपने ही जल से शर्मिंदा हैं।
उधर एक विमान
निर्लज्ज गति से
मंगल की ओर बढ़ चला है।
उसमें बैठे हैं—
सत्ता की कुर्सियों से चिपके राजनेता,
धर्म को ठेके पर उठाए सौदागर,
पूँजी के कवच में छिपे
मानवता के शिकारी,
मंत्रों और कथाओं को
ढाल बनाए
आस्था के दलाल।
वे पलायन नहीं कर रहे—
वे अपने विस्तार की
नई भूमि खोज रहे हैं।
और उधर मंगल—
लाल नहीं,
भय से निर्वर्ण—
सूर्य की ओर देखता है।
वह पुकारता है—
“हे सूर्य,
इससे पहले कि यह विमान
मेरी मिट्टी को छुए,
मुझे जला दे।
मेरी चट्टानों को भस्म कर,
मेरे आकाश को राख कर दे,
मेरे अस्तित्व को
अग्नि में विलीन कर दे—
मुझे
दूसरी पृथ्वी मत बनाना।”

चाँद टूट रहा है

चाँद टूट रहा है— और उसके विखंडन से उठी धूल आकाश की नहीं, पूरी पृथ्वी की साँसों में भर रही है। धरती अब ग्रह नहीं, एक थकी हुई देह है— जहाँ नदि...